Editorial: स्वस्च्छ शहर-स्वस्थ भारत!

हमने भले ही शहरों और गांवों को सफाई की प्रतिस्पर्धा में शामिल करते हुए स्वच्छता पुरस्कार शुरू किए हों, लेकिन एक सच यह भी है कि गांवों के साथ ही शहरों में भी सफाई से लेकर कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बना हुआ है। खासकर शहरों में कचरा प्रबंधन और सीवेज की समस्या वास्तव में बड़ी चुनौती है, इसके लिए केवल सरकार या स्थानीय निकायों की लापरवाही ही जिम्मेदार नहीं होती, अपितु लोगों का सिविक सेंस भी आड़े आता है।
शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन में दो मुख्य आब्जेक्ट होते हैं – सामान्य कचरा और दूसरा सीवेज। अब बड़े शहरी क्षेत्रों में कचरे के स्वरूप बदल रहे हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट, निर्माण कार्यों से निकलता मलबा, अस्पताल या बायोमेडिकल वेस्ट और प्लास्टिक वेस्ट की मात्रा बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि शहरों में कचरे का कुप्रबंधन न केवल पर्यावरण प्रदूषण पैदा कर रहा है बल्कि इससे मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ रहा है।
एक संदर्भ पर नजर डालें तो, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत के शहर हर साल 58 मिलियन टन कचरा पैदा करते हैं। जिस तेज गति से कचरा बढ़ रहा है, अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2030 तक यह 165 मिलियन टन और 2050 तक 436 मिलियन टन तक पहुंच जाएगा। हालांकि जब से स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत हुई है, शहरों में ठोस अपशिष्ट के ट्रीटमेंट की क्षमता 26 हजार टन प्रतिदिन यानि 18 प्रतिशत से बढक़र 1 लाख टन प्रतिदिन यानि 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लेकिन यह भी कम ही है।
शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन और इसके निष्पादन में सुधार हुआ है, लेकिन हमारे यहां आज भी लोग कचरे को यहां-वहां फेंककर अपनी गंदी आदतों और लापरवाही का परिचय देते रहते हैं। आज भी घनी बस्तियों में कचरा एकत्र करना भी बड़ी चुनौती बना हुआ है, जहां हर तरह का कचरा यहां-वहां फेक दिया जाता है। वैज्ञानिक भाषा में बात करें तो इस फेके हुए कचरे से कवेल मिट्टी और भूजल ही प्रदूषित नहीं होता है, अपितु ऐसे कचरे के ढेर में आग लगने से मीथेन निकलती है, जिससे जीएचजी लेवल बढ़ता है। और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है।
शहरों में प्लास्टिक की पैकेजिंग भी बड़ी समस्या है। ये दुनियाभर में गंभीर है और प्लास्टिक कूड़ा नदियों में मिलकर समुद्र को दूषित कर रहा है। यूएनईपी के मुताबिक हर सेकंड, करीब एक ट्रक प्लास्टिक समुद्र में मिल रहा है। अगर इस पर काबू नहीं किया गया तो 2050 तक समुद्री कूड़ा मछलियों से ज्यादा हो जाएगा। इसमें इलेक्ट्रानिक वस्तुओं का कचरा और बड़ी समस्या बन गया है। यह न तो पूरी तरह से नष्ट होता है और न ही इसके जलाया जा सकता है। इसके कारण की कचरा प्रबंधन की चुनौती और गंभीर होती जा रही है।
शहरों में देखें तो कचरे को नष्ट करने के संयंत्र भी लगाए जा रहे हैं, लेकिन उनमें सभी प्रकार का कचरा नष्ट नहीं हो पाता है। और पूरा कचरा भी नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिए कुछ इलाके तय करके वहां कचरा फेका जाता है। वहां कचरे के पहाड़ बन जाते हैं। जब शहर का विस्तार होता है तो ये कचरे के पहाड़ कई बार उस बस्ती के लिए केवल दुर्गंध ही नहीं फैलाते, साथ में प्रदूषण और बीमारियां भी फैलाते हैं।
शहरों में दूसरी समस्या सीवेज की होती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बात करें तो यहां के आंकड़े बताते हैं कि 2020-21 में शहरी क्षेत्रों में 72,368 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज निकला है, जबकि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की मौजूदा क्षमता 36,842 एमएलडी थी। इसके बाद क्षमता तो बढ़ी है, लेकिन उसके अनुपात में सीवेज और ज्यादा बढ़ गया है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार जितना भी सीवेज निकलता है, उसके 28 फीसदी का ही ट्रीटमेंट हो पाता है। बाकी की समस्या अपनी जगह है, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जो कीचड़ निकलता है, इसका भी विधिवत निपटारा करना पड़ता है और ज्यादातर शहरों में इसके लिए आधारभूत ढांचा नहीं है।
गैरनिष्पादित सीवेज अपने आप में बड़ी समस्या बन जाता है। इसके कारण नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सीवेज के ट्रीटमेंट की कमी के कारण भारत में जल-जनित बीमारियों के इलाज में 15 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च होते हैं। ज्यादातर शहर इस तरह की सीवेज ट्रीटमेंट सुविधाएं इसलिए नहीं जुटा पा रहे हैं क्योंकि इनके निर्माण के साथ, संचालन और प्रबंधन में बहुत पूंजी लगती है और अधिकांश सीवेज प्लांट्स को चलाने में बिजली भी बहुत ज्यादा खर्च होती है। इसलिए शहर और कस्बों को मिलकर, घनी आबादी वाले इलाकों के लिए केंद्रीकृत सीवेज सुविधा और ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण करना होगा। जहां जनसंख्या का दबाव कम है, वहां विशेषज्ञ रूट ज़ोन सिस्टम को विकेंद्रीकृत करने पर जोर देते हैं। सूरत के बारे में एक अच्छी बात यह है कि यह शहर सीवेज को ट्रीट करके इंडस्ट्रीज़ को बेचकर हर साल 150 करोड़ रुपए कमाता है। इससे और शहरों को सीख लेना चाहिए।
अपने देश की बात करें तो महानगरों में कचरा प्रबंधन को और मजबूत करना होगा। साथ ही जिन शहरों का विस्तार हो रहा है, वहां पहले कचरा और सीवेज की व्यवस्था की जाए, फिर विस्तार किया जाए, तब हम शहरों के बढ़ते प्रदूषण को कम कर पाएंगे। साथ ही दूषित पानी की जो समस्या शहरों में बढ़ रही है, उस पर भी इससे ही पार पा सकेंगे। हमें शहरों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों के अंदर सिविक सेंस विकसित करना होगा। अभियान जो कागजों पर चल रहा है, उसे मैदान में उतारना होगा, तभी हम स्वच्छ और स्वस्थ भारत की कल्पना को साकार कर पाएंगे।
– संजय सक्सेना



