ग्वालियर में इस साल की शुरुआत में एक बार फिर अंबेडकर विवाद गहरा गया है। 1 जनवरी को डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर जलाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसे लेकर जबरदस्त विरोध हुआ और भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी समेत विभिन्न दलित संगठनों ने कलेक्ट्रेट पर करीब ढाई घंटे तक धरना-प्रदर्शन किया।
पुलिस ने बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा समेत 7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। 7 जनवरी को सभी को कोर्ट ने जमानत पर रिहा कर दिया। दरअसल, ये विवाद कोई नया नहीं है। ग्वालियर में पिछले एक साल से ये विवाद गर्माया हुआ है। जानकारों के मुताबिक अब इसकी आड़ में राजनीतिक और जातीय संघर्ष की स्थितियां पैदा की जा रही हैं।
इस कहानी की शुरुआत 19 फरवरी, 2025 को हुई, जब मध्य प्रदेश के तत्कालीन चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ ग्वालियर के दौरे पर थे। इस अवसर पर, वकीलों के एक समूह ने उन्हें ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की एक प्रतिमा स्थापित करने के लिए एक ज्ञापन सौंपा। यह कोई एक जाति या समूह का प्रयास नहीं था।
ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक, महेंद्र प्रताप सिंह रघुवंशी बताते हैं, ‘जिस ज्ञापन पर मैंने हस्ताक्षर किए थे, उसमें अनुसूचित जाति, ठाकुर, पिछड़ी जाति और ब्राह्मण, सभी जातियों के वकील शामिल थे। यह एक संस्थागत मामला था, सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर हम अपने हाई कोर्ट में भी संविधान निर्माता को सम्मान देना चाहते थे।’
यह पहल तेजी से आगे बढ़ी। ठीक एक महीने बाद, 19 मार्च, 2025 को, हाई कोर्ट से प्रतिमा स्थापना का आधिकारिक आदेश जारी हो गया। अगले ही दिन, 20 मार्च को, लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को मूर्ति के लिए चबूतरा निर्माण का काम सौंप दिया गया था।
मुद्दे को भुनाकर नेता बनने की कोशिश
यह विवाद अब केवल एक मूर्ति का नहीं रह गया है। इसके पीछे कई तरह की विचारधाराएं, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और सामाजिक असुरक्षा काम कर रही हैं। मूर्ति लगाने के लिए दिए गए ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले महेंद्र प्रताप सिंह रघुवंशी इस पूरे घटनाक्रम से निराश हैं। वे कहते हैं, ‘यह एक बहुत छोटा और संस्थागत मामला था।
इस फैसले से सहमत और असहमत होना लोगों का व्यक्तिगत विचार हो सकता है, लेकिन इसे जिस दिशा में ले जाया गया, वह निराशाजनक है। इस मामले को जबरदस्ती जातिगत विरोध बना दिया गया। अब मूर्ति स्थापना का मुद्दा तो एक तरफ रह गया है, और इसकी आड़ में अलग-अलग मामले चलाए जा रहे हैं।’
वे आगे कहते हैं कि कुछ लोग इस मुद्दे से नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं, जो समाज के लिए गलत है। उनका मानना है कि सामाजिक सौहार्द किसी भी मूर्ति से बढ़कर है और इस पर फैसला कोर्ट को ही करना चाहिए, बाहरी लड़ाई की कोई जरूरत नहीं है।
यह एक राजनीतिक एजेंडा है
ग्वालियर बार काउंसिल के अध्यक्ष पवन पाठक इस पूरे विवाद को एक ‘नया तमाशा’ और ‘राजनीतिक एजेंडा’ करार देते हैं। उनका आरोप है, ‘यह चारों पार्टियां (बीजेपी, बीएसपी, कांग्रेस और भीम आर्मी) कुल मिलाकर देश में हंगामा कर रही हैं। पूरे देश में भीम आर्मी के नाम से एक प्रायोजित एजेंडा चल रहा है, जिसके तहत वे जगह-जगह उपद्रव फैला रहे हैं।
ये लोग अंबेडकर की मूर्तियां लगाना चाहते हैं और उनके नाम पर अवैध वसूली और झूठे मुकदमे कर रहे हैं। पाठक एक चौंकाने वाला दावा करते हैं कि मूर्ति लगाने का प्रस्ताव “फर्जी” था। वे कहते हैं, “कलेक्टर ग्वालियर और कुछ भीम आर्मी के लोगों ने मिलकर एक गलत लेटर तैयार किया। यह बार काउंसिल की तरफ से नहीं था।
दूसरा पक्ष बोला- यह संविधान निर्माता का अपमान है
दूसरी ओर, प्रतिमा स्थापना की मांग करने वाले वकील विश्वजीत रतोनिया इसे जातिवादी मानसिकता का परिणाम बताते हैं। वे कहते हैं, ‘हमने सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर सभी जातियों के वकीलों के साथ मिलकर यह मांग की थी। एक महीने में आदेश आ गया, पीडब्ल्यूडी ने चबूतरा बनाया और सभी वकीलों के सहयोग से क्लाउड फंडिंग के जरिए मूर्ति आई। लेकिन जब मूर्ति आई, तो उसे कोर्ट परिसर में लाने से रोका गया।’
वे इस विवाद को एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा मानते हैं। जिस तरीके से इस विवाद को सड़कों पर ले जाया गया, बाबा साहब की तस्वीर जलाई गई, यह सब सुनियोजित है। यह मूर्ति स्थापना के मुद्दे से हटकर आरक्षण का विरोध करने और संविधान को बदलने की कोशिश है।
माहौल खराब करने की कोशिश हो रही
बार काउंसिल के उपाध्यक्ष सरनाम सिंह कुशवाह एक संतुलित दृष्टिकोण रखते हैं। वे मानते हैं कि मामला अभी तक पूरी तरह से जातीय संघर्ष का नहीं बना है, लेकिन कुछ लोग जानबूझकर इसे उस दिशा में ले जा रहे हैं। वे कहते हैं, ‘मूर्ति अब तक स्थापित हो जानी चाहिए थी, लेकिन उसे वापस भेजना पड़ा।
जो लोग विरोध कर रहे थे, वही लोग सड़कों पर बाबा साहब का अपमान कर रहे हैं, जिन पर अब मुकदमा भी दर्ज है। कुशवाह का मानना है कि ऐसी घटनाओं से न केवल बार का, बल्कि पूरे शहर का माहौल खराब होता है। वे कहते हैं, “अगर एक पक्ष उकसाएगा, तो आप दूसरे पक्ष से शांत रहने की उम्मीद नहीं कर सकते।’
प्रतिमा मूर्तिकार के पास और प्रशासन की समझाइश
वह प्रतिमा, जो इस पूरे विवाद के केंद्र में है, आज भी मूर्तिकार अनुज राय के पास सुरक्षित रखी है। अनुज बताते हैं कि मूर्ति वापस आने के बाद महीनों तक उनके घर पर पुलिस का पहरा था। वे कहते हैं, मुझे स्टैच्यू बनाने का ऑर्डर कलेक्ट्रेट से मिला था और इसका फंड बार काउंसिल के सदस्यों ने दिया था।
वहीं, ग्वालियर आईजी अरविंद सक्सेना का कहना है कि इस मामले में दो पक्ष हैं, उन्होंने कई बार अलग-अलग तरह से विरोध किया है। हमनें दोनों पक्षों को यही बताया है कि उन्हें कानूनी तरीके से ही इसका समाधान ढूंढना चाहिए।
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