RSS : संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी-पंथनिरपेक्ष, संघ ने क्यों की इन शब्दों पर चर्चा की बात…?

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के उस बयान पर विवाद शुरू हो गया है, जिसमें उन्होंने देश के संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को रखे जाने पर चर्चा की बात कही है। होसबाले ने कहा था कि कांग्रेस को 50 साल पहले इंदिरा गांधी सरकार की ओर से लगाए गए आपातकाल के लिए माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष जैसे शब्द जोड़े गए थे (इमरजेंसी के दौरान)। इन्हें हटाने के लिए भी बाद में प्रयास नहीं हुए। इसलिए इस पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या इन शब्दों को रहना चाहिए या नहीं। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जो संविधान बनाया, उनकी प्रस्तावना में ये दोनों शब्द नहीं थे। होसबाले के इस बयान का आरएसएस और भाजपा के कुछ नेताओं ने भी समर्थन किया है।
1946 में जवाहरलाल नेहरू ने संवैधानिक ढांचे का वर्णन करते हुए उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था। 1947 (22 जनवरी) में इसे अपनाया गया। इसने भारत के संविधान को आकार दिया और इसका संशोधित रूप भारतीय संविधान की प्रस्तावना में परिलक्षित होता है।
पूरी प्रस्तावना कुछ इस प्रकार है….
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में,व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
प्रस्तावना में क्या-क्या शामिल है और इनका महत्व क्या है?
हमारे संविधान की प्रस्तावना कई घटकों से मिलकर बनी है। इसमें यह संकेत दिया गया है कि संविधान की सत्ता का स्रोत भारत की जनता के पास है। यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। प्रस्तावना में लिखे गए उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता सुनिश्चित करने और राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देने की बात करते हैं।
हम, भारत के लोग: यह भारत के लोगों की परम संप्रभुता को दर्शाता है। संप्रभुता का अर्थ है देश किसी अन्य देश या बाहरी शक्ति के नियंत्रण के अधीन नहीं है।
संप्रभु: इसका अर्थ है कि भारत की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और इस पर किसी अन्य बाहरी शक्ति का प्रभुत्व नहीं है। देश में, विधायिका के पास कानून बनाने की शक्ति है जो कुछ सीमाओं के अधीन है।

समाजवादी: इस शब्द का मतलब है लोकतांत्रिक तरीकों से समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति। यह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है जहां निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र एक साथ रहते हैं। इसे संविधान के 42वें संशोधन, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया।
पंथनिरपेक्ष: इस शब्द का अर्थ है कि भारत में सभी धर्मों को राज्य से समान सम्मान, संरक्षण और समर्थन मिलता है। इसे भी 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में शामिल किया गया।
लोकतांत्रिक: इस शब्द का मतलब है कि भारत के संविधान का एक स्थापित स्वरूप है जो चुनाव में व्यक्त लोगों की इच्छा से अपना अधिकार प्राप्त करता है।
गणतंत्र: यह शब्द बताता है कि राज्य का मुखिया जनता द्वारा चुना जाता है। भारत में, भारत का राष्ट्रपति राज्य का निर्वाचित प्रमुख होता है।
इन शब्दों के प्रस्तावना में होने पर विवाद क्यों है?
भारत के संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द को लेकर विवाद है। इन दोनों शब्दों पर ही संविधान पर काम करने वाली संविधान सभा में विचार हुआ था। हालांकि, तब बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने समाजवाद को संवैधानिक मत न मानते हुए अस्थायी नीति करार दिया था। तब आंबेडकर ने तर्क दिया कि प्रस्तावना में समाजवाद को अपरिवर्तनीय सिद्धांत के रूप में वर्णित करना लोकतांत्रिक लचीलेपन को कमजोर करेगा। राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, यह ऐसे मामले हैं, जिन्हें लोगों को समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं तय करना चाहिए। इसे संविधान में ही नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देगा।
आंबेडकर के इन्हीं तर्कों का हवाला देते हुए आलोचक संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द शामिल करने के खिलाफ रहे हैं। खासकर इंदिरा गांधी की तरफ से आपातकाल लगाए जाने के दौरान इस शब्द को प्रस्तावना में जोड़ने पर खासा विवाद रहा।
दूसरी तरफ प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ को लेकर भी विवाद रहा है। आंबेडकर, जो कि खुद बौद्ध धर्म को अपना चुके थे, वह भारत की बहुसांस्कृतिक विशिष्टता को मानते थे। पंथनिरपेक्षता के बारे में आंबेडकर का मानना था कि यह शब्द अनावश्यक है, क्योंकि संविधान ने पहले से ही मौलिक अधिकारों के माध्यम से इसकी गारंटी दी है। उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षता पहले से ही प्रस्तावना के मसौदे में निहित है और व्यापक संवैधानिक ढांचे ने धार्मिक तटस्थता सुनिश्चित की है।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद समाजवाद और पंथनिरपेक्षता के समर्थकों में गिने जाते रहे हैं। उन्होंने कई मौकों पर धार्मिक स्वतंत्रता की वकालत भी की। हालांकि, इसके बावजूद उन्होंने समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द को संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने पर जोर नहीं दिया। नेहरू का मानना था कि संविधान के ढांचे में यह दोनों ही बातें निहित हैं।
प्रस्तावना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
सर्वोच्च न्यायालय ने (बलराम सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2024) मामले में संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी फैली हुई है। तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना ने फैसले के बाद कहा कि इतने साल हो गए हैं, अब इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है। हमने स्पष्ट किया है कि इतने वर्षों के बाद इस प्रक्रिया को इस तरह से निरस्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि याचिकाओं पर आगे विचार-विमर्श और निर्णय की जरूरत नहीं है।
अदालत ने कहा था कि प्रस्तावना के मूल सिद्धांत पंथनिरपेक्ष लोकाचार को दर्शाते हैं। केशवानंद भारती और एसआर बोम्मई केस में संविधान पीठ के निर्णयों सहित कई फैसलों में कहा गया है कि पंथनिरपेक्षता संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। यद्यपि 42वें संविधान संशोधन से पहले संविधान में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द मौजूद नहीं था, फिर भी पंथनिरपेक्षता अनिवार्य रूप से सभी धर्मों के लोगों के साथ समान और बिना किसी भेदभाव के व्यवहार करने की राष्ट्र की प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करती है।
समाजवाद के संबंध में न्यायालय ने कहा था कि भारतीय ढांचे में समाजवाद आर्थिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है। इसमें राज्य यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नागरिक आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण वंचित न रहे। ‘समाजवाद’ शब्द आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लक्ष्य को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कई संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष और समाजवाद शब्दों को पश्चिमी नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस खन्ना ने कहा था कि समाजवाद का अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसरों की समानता हो और देश की संपत्ति का समान वितरण हो। पंथनिरपेक्ष शब्द के साथ भी यही बात है।





