Sonam wangchuk की शांति की अपील वाला भाषण निरोधक प्राधिकरण से छिपाया गया, सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, भाषण का वीडियो चलाया

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के तहत हुई हिरासत को चुनौती देने वाली हैबियस कॉर्पस याचिका पर विस्तार से सुनवाई की। यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो ने दायर की है। हालिया लद्दाख आंदोलनों के बाद वांगचुक की हिरासत की गई थी, जिनके बारे में आरोप है कि वे हिंसक हो गए थे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की खंडपीठ ने दिन के दूसरे सत्र में पूरे समय तक मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पेश हुए।
सिब्बल ने दलील दी कि 26 सितंबर 2025 के हिरासत आदेश का आधार मुख्यतः चार वीडियो हैं—दो 10 और 11 सितंबर के, तथा दो 24 सितंबर के। हालांकि, 29 सितंबर को जब हिरासत के आधार (grounds of detention) दिए गए, तब ये चारों वीडियो हिरासत में रखे गए व्यक्ति को उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि यदि हिरासत के आधार दिए जाएँ लेकिन उन पर निर्भर दस्तावेज़ न दिए जाएँ, तो यह संविधान के अनुच्छेद 22 का उल्लंघन है। केंद्र सरकार के यह कहने के बावजूद कि सामग्री दी गई थी, सिब्बल ने कहा कि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं दिखाया गया।
सिब्बल ने यह भी बताया कि हिरासत के आधार 28 दिन की गंभीर देरी से दिए गए, जो वैधानिक समयसीमा का स्पष्ट उल्लंघन है। 29 सितंबर को वांगचुक को केवल हिरासत आदेश और अधूरे आधार दिए गए—क्योंकि जिन चार वीडियो पर हिरासत का सबसे निकट और प्रमुख आधार बताया गया, वे उस दिन नहीं दिए गए। उन्होंने कहा कि बाद में जो दिया गया, वह केवल वीडियो के लिंक थे। 5 अक्टूबर को लैपटॉप देने से भी कमी दूर नहीं हुई, क्योंकि 29 सितंबर को दिए गए पेन ड्राइव में ये चार वीडियो थे ही नहीं।
बार-बार माँग के बावजूद वीडियो नहीं मिले सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक ने हिरासत से कई पत्र लिखकर बताया कि चार वीडियो गायब हैं और उनकी प्रतियाँ माँगीं, लेकिन वे कभी उपलब्ध नहीं कराई गईं। उन्होंने यह भी कहा कि वांगचुक की पत्नी को उन पत्रों की प्रतियाँ देने का आश्वासन दिया गया था, पर एक घंटे से अधिक प्रतीक्षा और उड़ान छूटने के बावजूद दस्तावेज़ नहीं दिए गए। कानूनी स्थिति और मिसालें सिब्बल ने जोर देकर कहा कि जिन दस्तावेज़ों पर हिरासत के आधार टिके हों, उनकी आपूर्ति न होने पर हिरासत आदेश स्वतः अवैध हो जाता है—यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में स्थापित है।
उन्होंने Ahmed बनाम Union of India का हवाला दिया, जहाँ अदालत ने कहा था कि जिस दस्तावेज़ पर भरोसा किया गया हो (जैसे जमानत आवेदन), उसकी आपूर्ति न होना प्रभावी प्रतिनिधित्व के अधिकार का उल्लंघन है। सिब्बल ने यह भी कहा कि यह अप्रासंगिक है कि हिरासत में रखा गया व्यक्ति दस्तावेज़ों की सामग्री पहले से जानता था या उसने विशेष रूप से माँग की थी—संवैधानिक दायित्व निरोधक प्राधिकरण का है कि वह सभी निर्भर सामग्री दे। उन्होंने Khudiram Das का संदर्भ देते हुए कहा कि अदालत का दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि सभी वैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन हुआ हो और किसी को भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संविधान व कानून के सख्त अनुपालन के बिना वंचित न किया गया हो।





