नई दिल्ली। भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कॉलेजियम प्रणाली को “पूरी तरह विफल” बताते हुए कहा कि इस व्यवस्था ने न्यायपालिका की गुणवत्ता, स्वतंत्रता और संवैधानिक दृष्टि पर गंभीर असर डाला है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें सेकेंड जजेज केस में पेश होने का आज अफसोस है, क्योंकि जिस व्यवस्था से कार्यपालिका के हस्तक्षेप को रोकने की उम्मीद थी, वह बाद में और खराब स्थिति में बदल गई।
दुष्यंत दवे ने कॉलेजियम पर क्या कहा?
‘दिल से विद कपिल सिब्बल’ कार्यक्रम में बातचीत के दौरान दुष्यंत दवे ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका के कई फैसलों से यह महसूस होता है कि कुछ न्यायाधीश संविधान की मूल भावना और संविधान सभा की बहसों से दूर होते गए हैं। उनके अनुसार इसकी एक बड़ी वजह न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया है।
दवे ने कहा कि 1993 के सेकेंड जजेज केस के बाद न्यायपालिका का स्वरूप बदल गया। उनके मुताबिक, 1990 से पहले कार्यपालिका द्वारा कुछ विवादित नियुक्तियां जरूर हुईं, लेकिन वे अपवाद थीं। उस दौर में मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों पर व्यापक विचार-विमर्श होता था और अपेक्षाकृत बेहतर नियुक्तियां होती थीं।
‘कॉलेजियम ने न्यायपालिका की गुणवत्ता प्रभावित की’
दवे का आरोप है कि कॉलेजियम व्यवस्था ने न केवल नियुक्तियों की पारदर्शिता को प्रभावित किया बल्कि उच्च न्यायपालिका की क्षमता और चरित्र पर भी असर डाला। उन्होंने कहा कि कई योग्य वकीलों और अधीनस्थ न्यायपालिका के उत्कृष्ट न्यायाधीशों को पदोन्नति नहीं मिली, जबकि कम योग्य लोगों को उच्च न्यायालयों और शीर्ष पदों तक पहुंचने का अवसर मिला।
उन्होंने यह भी कहा कि आज बार में कई ऐसे उत्कृष्ट अधिवक्ता हैं जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के योग्य हैं, लेकिन वर्षों से उनकी अनदेखी की जा रही है।
कपिल सिब्बल ने क्यों जताया अफसोस?
कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने सेकेंड जजेज केस में इसलिए पक्ष रखा था ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का अत्यधिक हस्तक्षेप रोका जा सके। हालांकि अब उन्हें लगता है कि उस फैसले के परिणामस्वरूप बनी व्यवस्था ने अपेक्षित सुधार नहीं किया और स्थिति पहले से अधिक खराब हो गई। इसलिए उन्हें उस मामले में अपनी भूमिका पर अफसोस है।
NJAC मामले का भी किया जिक्र
दवे ने नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) मामले की सुनवाई को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उस दौरान उन्होंने अदालत में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि न्यायाधीश आम वकीलों की वास्तविक राय जानना चाहते हैं तो उन्हें पहचान छिपाकर अदालतों के गलियारों में जाना चाहिए। उनका कहना था कि उनका उद्देश्य किसी न्यायाधीश के चरित्र पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि कॉलेजियम प्रणाली की खामियों की ओर ध्यान दिलाना था।
कॉलेजियम सिस्टम क्या है?
कॉलेजियम प्रणाली के तहत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम न्यायाधीश मिलकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण की सिफारिश करते हैं। यह व्यवस्था संविधान में स्पष्ट रूप से लिखी नहीं है, बल्कि 1993 के सेकेंड जजेज केस और बाद के न्यायिक फैसलों के जरिए विकसित हुई। इसकी आलोचना लंबे समय से पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को लेकर होती रही है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करती है।
दुष्यंत दवे और कपिल सिब्बल की टिप्पणियां व्यक्तिगत और संस्थागत आलोचना के रूप में सामने आई हैं। ये बयान न्यायाधीशों की नियुक्ति व्यवस्था पर चल रही व्यापक बहस को फिर से केंद्र में ले आए हैं, हालांकि कॉलेजियम प्रणाली को लेकर अंतिम निर्णय और किसी भी बदलाव का अधिकार संवैधानिक प्रक्रिया तथा न्यायिक व्याख्या के दायरे में ही आता है।
कॉलेजियम सिस्टम ‘पूरी तरह विफल’ हो गया: दुष्यंत दवे; कपिल सिब्बल बोले- सेकेंड जजेज केस में पेश होने का अफसोस
