नई दिल्ली. भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने आगाह किया है कि मध्यस्थता के मामलों में ज्यादा न्यायिक दखलंदाजी से विवादों के निपटारे की इस पारंपरिक व्यवस्था के प्रति भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
सीजेआई सूर्यकांत ने शुक्रवार को आईसीए इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के पांचवें सत्र के उद्घाटन भाषण में अपने यह विचार सामने रखे। भारत के सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी की राय है कि अदालतों को मध्यस्थता की कार्यवाही और फैसलों में दखल देते समय संयम बरतना चाहिए।
असाधारण परिस्थितियों में ही अदालतें दखल दें’
इस मौके पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता के खिलाफ निषेधाज्ञा का इस्तेमाल बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होना चाहिए, जैसे कि निर्णय की समीक्षा के रूप में। क्योंकि, मध्यस्थता की स्वायत्तता बचाए रखने के लिए इस तरह की दखलंदाजी बहुत ही संयम से होना जरूरी है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में पसंदीदा मार्ग है मध्यस्थता’
सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि मध्यस्थता अब सिर्फ विवाद के समाधान का तरीका नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में पसंदीदा मार्ग के तौर पर भी देखना चाहिए।
उनकी राय में कारोबारी विवाद के समाधान में स्पष्टता और पूर्वानुमान बहुत मायने रखते हैं,खासकर दो देशों के बीच लेनदेन में। ऐसी जगहों पर संबंधित पक्षों को निष्पक्ष और लागू करने लायक सक्षम व्यवस्था की जरूरत पड़ती है।
सीजेआई का कहना है कि विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता एक ‘एक्सप्रेस हाइवे’ है।
इस व्यवस्था को प्रभावी और सुलभ बने रहना चाहिए, ताकि पार्टियां पारंपरिक मुकदमेंबाजी को प्राथमिकता दें।
सीजेआई सूर्यकांत ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि टेक्नोलॉजी ने मध्यस्थता की व्यवस्था को और मजबूत करने का रास्ता तैयार किया है।
