संजीव शर्मा
गर्मी से दहक रहे मैदानी इलाकों में सुनहरी आभा से जगमगाता यह पेड़ बरबस ही/ बार बार अपनी ओर खींच रहा था..और फिर क्या था हम भी खुद को रोक न सके और उससे जान पहचान बढ़ाने के लिए उसके पास जाने के लिए विवश हो गए… वैसे इश्क़ भी तो यही करता है..अपनी ओर खींचता है और आप बेबस से खिंचे चले जाते हैं। मैंने पहले कभी इतने ध्यान से इस पेड़ को फूलते नहीं देखा था क्योंकि प्रकृति से थोड़ा सा भी प्यार करने वाले हर शहर/इलाक़े में चटक केसरिया-लाल फूलों से लदे गुलमोहर और रंग बिरंगे तितलियों से फूलों से भरे बोगनबेलिया आपको कुछ और देखने ही नहीं देते या फिर शाम ढलते ही मधुमालती की महक हमारा आपका ध्यान भटका देती है लेकिन जब तपती दोपहर में 45 डिग्री तापमान में सूरज से निडर होकर नैन मटक्का करते इन फूलों को देखा तो फिर न मन माना और न ही मोबाइल का कैमरा।..आख़िर सूरज की तपिश से उसी का रंग लेकर मनमोहक नजारों वाले इस ‘अमलतास’ के पेड़ में कुछ तो अलग है,जो इसे खास और बहुत खास बनाता है।
अमलतास की खास बात यह भी है कि गर्मियों की तपती दोपहर में जब अधिकांश पेड़ मुरझाए से दिखाई देते हैं, तब पीले फूलों से लदा यह पेड़ मानो धरती पर उतरी धूप का उत्सव बन जाता है। इसकी लंबी-लंबी झूलती सुनहरी लड़ियाँ हवा के साथ ऐसे लहराती हैं, जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से स्वर्णिम श्रृंगार किया हो। युवा सौंदर्य की तरह सड़क किनारे खिला अमलतास हमें पल भर ठहरकर उसे निहारने पर मजबूर कर देता है। इसकी चमकती पीली आभा केवल आंखों को सुकून नहीं देती, बल्कि मन में भी एक अजीब-सी ताजगी और प्रसन्नता भर देती है।
तपते मौसम में अमलतास का खिलना यह एहसास कराता है कि कठिन समय में भी सुंदरता और उम्मीद अपनी पूरी चमक के साथ जीवित रह सकती है। तभी तो कवियत्री काव्या ने अपने पेज पर लिखा है:
“पीले झूमरों से सजा
महल सा लगता है
मई की गर्मी में
दिल को सुकून बाँटता
बस यूँ ही मुड़ जाते कदम
उस रमणीय वृक्ष के पास
कौतूहल से भरा
यह मन चिल्लाया था
कौन है यह मनमोहन
कौन है यह वृक्षों में
उगलता स्वर्ण?
अमलतास!!”
…..जैसे वृहस्पतिवार/गुरुवार को पीले कपड़ों में दफ्तरों-बाजारों में सौंदर्य बिखरा रहता है वैसे ही जब आँखें सड़कों पर बिखरे अमलतास के खिलखिलाते पीले फूलों पर ठहरी तो हाथ इंटरनेट पर इसका पता-ठिकाना(तथ्य) जानने के लिए मचल उठे। फिर गूगल गुरु ने बताया कि अपन तो इसके नए नए आशिक़ हैं और हमसे पहले तमाम बड़े कवि-लेखक अमलतास से इश्क़ लड़ा चुके हैं। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने तो अपनी कविता में पूछा है:
“धरती तपती लोहे जैसी
गरम थपेड़े लू भी मारे ।
अमलतास तुम किसके बल पर
खिल- खिल करते बाँह पसारे ।
पीले फूलों के गजरे तुम
भरी दुपहरी में लटकाए ।
चुप हैं राहें, सन्नाटा है
फिर भी तुम हो आस लगाए ।”
वाकई, झूमर से लटकते खिले खिले फूल, अपने रंग पर इतराते, यौवन पर इठलाते और क्षण भर में सड़कों की झोली को अपनी चपलता से भर देने वाले अमलतास में कुछ तो खास है वरना मई के सुलगते समय में किस की मज़ाल है जो सूरज को चुनौती दे सके। अमलतास के बारे में कहा जाता है कि इस पर फूल तभी लगना शुरू होते हैं जब इसकी जड़ें मजबूती से जम जाती हैं अर्थात परिपक्व होने के बाद…बिल्कुल वैसे ही जैसे चालीस पचास साल बाद का इश्क़… गम्भीर /परिपक्व/ स्थायी और हर पल गुदगुदाने वाला। तभी तो शायद कवियत्री मनप्रीत कौर ‘मन’ को लिखना पड़ा है:
“अमलतास की तरह महकता है,
मुरझाए से प्राणों में संगीत बुनता है ।
तुम्हारा प्रेम।।”
अमलतास आशिक़ों की ही पसंद नहीं बल्कि औषधि के जानकारों के लिए भी उतना ही खास है। आयुर्वेद के अनुसार, अमलतास के इस्तेमाल से बुखार, पेट की बीमारियां, त्वचा रोग, खांसी, टीबी और ह्रदय रोग आदि में लाभ लिया जा सकता है। इसके अलावा, मधुमेह, पीलिया, गठिया, छाले सहित तमाम रोगों के उपचार में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। अब तक मेरी तरह अमलतास से अनजान लोगों के लिए- इसे इंग्लिश में गोल्डन शॉवर और संस्कृत में राजवृक्ष भी कहा गया है। यह मूल रूप से स्वदेशी यानि हमारा अपना है जो म्यामांर से लेकर थाईलैंड तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। मजे की बात यह है कि थाईलैंड का यह राष्ट्रीय वृक्ष और फूल दोनों है। इसलिए आप चाहें तो अमलतास की मादकता का ‘बैंकाक कनेक्शन’ स्थापित कर सकते हैं। वैसे केरल में भी इसे राजकीय फूल का दर्जा हासिल है। अब फिर बात, इस पर मर मिटने की क्योंकि इन दिनों जब भी आप इसके क़रीब से गुजरेंगे, यह हौले से आप पर मुट्ठी भर पीले जगमग सितारे बिखेर देगा और बस आप भी कवियत्री ‘काव्या’ की तरह कह उठेंगे:
“रोक दे राहों में,
ऐसा तुम्हारा मोहपाश।
तुम कैसे इतना खिलखिलाते हो,
कह दो न सुंदर अमलतास।।”
…..वैसे तो अंगुलियां भी उतावली हैं और मन भी मचल रहा है कि आज का दिन बस अमलतास के नाम कर दिया जाए लेकिन बुद्धि कहती है कल के लिए भी कुछ पल बचाकर रखे जाएं इसलिए समापन रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की इन पंक्तियों के साथ,जो सब कुछ कह देती हैं:
“तुझे देखकर तो लगता है,
जो जितना तप जाता है ।
इन सोने के झूमर –जैसी,
खरी चमक वही पाता है ।
जीवन की कठिन दुपहरी में,
तुझसे सब मुस्काना सीखें ।
घूँट –घूँट पी रंग धूप का,
सब कुन्दन बन जाना सीखें ।”
इसलिए, यदि आप तपती दुपहरी में मन मारकर किसी काम से घर से बाहर निकले तो बस, अमलतास से थोड़ी सी ऊर्जा ले लें..यह आपकी तपन,मजबूरी और बेरुखी को भी मनमोहक बना देगा।
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