यादों के झरोखे से
भोपाल में टेलीफोन की दस्तक,  नवाबी दौर में संचार
क्रांति की 120 साल पुरानी अनसुनी कहानी

भोपाल की फिज़ाओं में कभी एक ऐसी आवाज़ गूंजती थी, जो सिर्फ घंटी नहीं, बल्कि एक नए युग की आहट थी। यह आवाज़ थी टेलीफोन की। एक ऐसी तकनीक, जिसने नवाबी शहर भोपाल को आधुनिकता की राह पर आगे बढ़ाने का काम किया। आज के स्मार्टफोन युग में यह बात भले ही साधारण लगे, लेकिन करीब 120 साल पहले टेलीफोन का होना किसी शान, हैसियत और दूरदर्शिता का प्रतीक माना जाता था।
बीसवीं सदी की शुरुआत का भोपाल एक बदलते दौर से गुजर रहा था। शहर में नवाबी तहज़ीब की गहराई थी, मगर आधुनिकता की हल्की-हल्की रंगत भी दिखाई देने लगी थी। उस समय पूरे शहर में बिजली की सुविधा नहीं थी। गली-मोहल्लों में अंधेरा जल्दी उतर आता, लेकिन महलों और कुछ खास इमारतों में रोशनी की व्यवस्था जरूर थी। इसी सीमित रोशनी के बीच संचार की एक नई किरण ने जन्म लिया – टेलीफोन।
दरअसल, भोपाल में टेलीफोन की शुरुआत कोई संयोग नहीं थी, बल्कि नवाब सुल्तान जहां बेगम की दूरदर्शी सोच का नतीजा थी। वर्ष 1903 में मध्यपूर्व की यात्रा के दौरान उन्होंने टेलीफोन तकनीक को करीब से देखा और उसकी उपयोगिता को समझा। उन्होंने महसूस किया कि अगर भोपाल को समय के साथ कदम मिलाकर चलना है, तो उसे इस आधुनिक साधन से जोड़ना आवश्यक है। यही सोच आगे चलकर एक ऐतिहासिक निर्णय में बदली।
वैसे देश में टेलीफोन सेवा की शुरुआत 28 जनवरी 1882 को कोलकाता में हुई थी, जहां पहला टेलीफोन एक्सचेंज स्थापित किया गया। इसके बाद मुंबई और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में भी यह सुविधा पहुंच गई। लेकिन एक रियासती शहर भोपाल में इसका प्रवेश अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। जब भोपाल में टेलीफोन व्यवस्था कायम हुई, तब मुल्क की कई रियासतों में यह सुविधा नहीं थी।
1906-07 के बीच भोपाल में टेलीफोन सेवा शुरू हुई और एक टेलीफोन एक्सचेंज स्थापित किया गया। शुरुआत में केवल 22 स्थानों पर टेलीफोन लगाए गए। इनमें कसरे-ए-सुल्तानी, लाल कोठी (अंग्रेज रेजिडेंट), मिंटो हॉल, जहांगीर कोठी (आज का पीएचक्यू), फ्लैग हाउस, शौकत महल, कैप्टन कुक का बंगला (वर्तमान सीएम हाउस) और स्टेट हाईकोर्ट जैसे महत्वपूर्ण स्थान शामिल थे। यह सभी स्थान उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र थे, जहां तेज और विश्वसनीय संचार की आवश्यकता थी।
शुरुआती दौर का टेलीफोन आज की तरह आसान नहीं था। न कोई नंबर, न कोई डायल-बस रिसीवर उठाइए और सीधे एक्सचेंज से जुड़ जाइए। वहां मौजूद ऑपरेटर को बताना पड़ता कि किससे बात करनी है। इसके बाद ऑपरेटर अपने स्विचबोर्ड पर तार जोड़कर दोनों व्यक्तियों के बीच संपर्क स्थापित कराता। यह पूरी प्रक्रिया तकनीक से ज्यादा इंसानी कौशल और सतर्कता पर निर्भर करती थी।
उस दौर में टेलीफोन ऑपरेटर का रुतबा भी कम नहीं था। वह शहर के प्रभावशाली लोगों से सीधे जुड़ा रहता था और उनकी बातचीत का माध्यम बनता था। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षित ये ऑपरेटर अपने काम में दक्ष होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से भी विशेष पहचान रखते थे।
जैसे-जैसे टेलीफोन कनेक्शनों की संख्या बढ़ी, यह मैन्युअल व्यवस्था धीरे-धीरे चुनौतीपूर्ण होने लगी। बढ़ती जरूरतों को देखते हुए करीब दो दशक के भीतर दो अंकों की डायलिंग प्रणाली शुरू की गई। 1930 के दशक में इसमें और सुधार हुआ,अब ऑपरेटर कॉल कनेक्ट करने से पहले नंबर पूछने लगा और स्विचबोर्ड के जरिए तार जोड़कर संपर्क स्थापित करता था।उसी समय यह सुविधा कसरे-ए-सुल्तानी से करीब 45 किलो मीटर चिकलोद कोठी में भी मुहैया कराई गई थी।

आज, जब एक स्पर्श में दुनिया हमारी उंगलियों पर होती है, तब यह जानना रोचक है कि कभी एक कॉल के लिए भी धैर्य, प्रक्रिया और इंसानी सहयोग जरूरी था। उस दौर की तकनीक सीमित जरूर थी, लेकिन उसमें एक अलग ही गरिमा और अपनापन था। एक ऐसा अनुभव, जो आज की तेज रफ्तार दुनिया में कहीं खो सा गया है।
भोपाल में टेलीफोन का यह नवाबी दौर केवल एक तकनीकी बदलाव की कहानी नहीं, बल्कि शहर की सोच, उसकी प्रगति और आधुनिकता की ओर उठाए गए कदमों का जीवंत दस्तावेज है। यह वह समय था, जब एक साधारण सी घंटी ने पूरे शहर को बदलते युग से जोड़ दिया और उसकी गूंज आज भी भोपाल की यादों के झरोखों में सुनाई देती है।

साभार

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