History of Bhopal : जब भोपाल की कानून-व्यवस्था ने पहरेदारी से पेशेवर अनुशासन की
ओर कदम बढ़ाए, भोपाल की कानून-व्यवस्था ने ओढ़ा नया लिबास

सुल्तान जहां बेगम की दूरदृष्टि से पड़ी आधुनिक पुलिस व्यवस्था की नींव
अलीम बजमी
इतिहास की धूल भरी गलियों में झांकें, तो एक ऐसा दौर सामने आता है, जब सत्ता भले ही महलों तक सीमित थी, लेकिन सुरक्षा की चिंता आम जन के आंगन तक गूंजती थी। यही वह समय था, जब भोपाल रियासत की आख़िरी महिला नवाब, बेगम सुल्तान जहां ने पुलिस व्यवस्था को महज़ पहरेदारी की परिधि से बाहर निकालकर आधुनिक सोच, अनुशासन और वैज्ञानिक दृष्टि की राह पर अग्रसर किया। लगभग 120 वर्ष पूर्व शुरू हुई यह यात्रा आज की आधुनिक पुलिसिंग की मजबूत बुनियाद बन गई।
यह वह कालखंड था, जब देश बदलाव की करवट ले रहा था और अपराध भी नए-नए रूप धारण कर रहे थे। ऐसे में भोपाल रियासत ने समय से एक कदम आगे बढ़कर अपराध अनुसंधान के पारंपरिक तरीकों को पीछे छोड़ा। वर्ष 1905 में पहली बार फिंगर प्रिंट को अपराध की पहचान का औजार बनाया गया। इंदौर फिंगर प्रिंट ब्यूरो की तर्ज पर भोपाल में इसकी शाखा का गठन उस दौर की असाधारण दूरदृष्टि का प्रमाण था। भरमार बंदूकों की जगह राइफल और रिवॉल्वर ने लीं। पुलिसकर्मी अब केवल चौकीदार नहीं रहे, बल्कि कानून के प्रशिक्षित और सजग रक्षक के रूप में पहचाने जाने लगे।
वैज्ञानिक सोच की शुरुआत
फिंगर प्रिंट तकनीक के साथ हथियारों का आधुनिकीकरण, पुलिस प्रशिक्षण और अनुशासन ने कानून-व्यवस्था को नई दिशा दी। यह बदलाव केवल संसाधनों तक सीमित नहीं था, बल्कि सोच में आए आमूलचूल परिवर्तन का संकेत था, जहां अपराध को समझने और रोकने के लिए विज्ञान को सहारा लिया गया।
शहरपनाह के भीतर सिमटा भोपाल
उस समय भोपाल की बसाहट रियासत के फतेहगढ़ किले की सीमादीवार (शहरपनाह)तक ही सिमटी थी। इसके बाहर जहांगीराबाद और शाहजहांनाबाद जैसे इलाके बस तो चुके थे, पर आबादी काफी सीमित थी। 1891 में भोपाल रियासत की जनसंख्या 9 लाख 54 हजार 991 बताई जाती है, जो 1901 में मामूली रूप से घटकर 9 लाख 52 हजार 486 रह गई। सीमित संसाधनों और विस्तृत भू-भाग के बीच कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। उल्लेखनीय है कि 18वीं और 19वीं सदी में ठगी और डकैती प्रमुख अपराध हुआ करते थे, जिनसे निपटने के लिए योजनाबद्ध पुलिसिंग की आवश्यकता महसूस की गई।
सरकारी हुक्मनामों से सुरक्षा का संदेश
अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए भोपाल रियासत में सख्त हुक्मनामे जारी किए गए। सर्दियों में रात 8 बजे और गर्मियों में रात 9 बजे के बाद बिना लालटेन के सड़कों पर निकलने पर पाबंदी थी। नवाब शाहजहां बेगम के दौर में बच्चों को बिना समुचित संरक्षण के गहने पहनाकर लाने-ले जाने पर रोक लगाई गई। उल्लंघन की स्थिति में गहने जब्त करने का प्रावधान था। ये आदेश उस समय नागरिक सुरक्षा को लेकर शासन की गंभीरता को दर्शाते हैं।
संस्थागत ढांचे की नींव
वर्ष 1912 में पुलिस का संगठित ढांचा अस्तित्व में आया। पहली बार आईजी और डीआईजी जैसे वरिष्ठ पद सृजित हुए, सात निरीक्षक पद स्वीकृत किए गए और रक्षित व आरक्षित बल का वर्गीकरण हुआ। जब देश के कई हिस्सों में पुलिस व्यवस्था परंपरागत ढर्रे पर चल रही थी, तब भोपाल इस दिशा में अग्रणी बन चुका था।
सुधारों की निरंतर शृंखला
1923 में शस्त्रों का आधुनिकीकरण हुआ। 1926 में ट्रैफिक पुलिस का गठन किया गया। 1928 में सीआईडी और 1936 में अपराध अनुसंधान ब्यूरो की स्थापना हुई। 1935 में पुलिस डायरी को आधुनिक स्वरूप मिला और वेतनमान तय किए गए। 216 वर्ग मील पर एक थाना स्थापित करने का प्रस्ताव लागू हुआ, जबकि 1944 में नायक पद का गठन इस सुधार यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
1857 से संगठित बल की जरूरत
फ्लैश बैक में जाए तो भोपाल में संगठित पुलिस बल की आवश्यकता पहली बार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महसूस की गई। उस समय नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना पर थी। सीहोर छावनी में हुए विद्रोह ने स्थायी पुलिस बल की अहमियत उजागर कर दी। परिणामस्वरूप 1886 कर्मियों की एक टुकड़ी गठित हुई और अपराध पंजीकरण की लिखित परंपरा की शुरुआत हुई।
ब्रिटिश प्रशासनिक सोच की झलक
बुजुर्गों के मुताबिक नवाब सिकंदर जहां बेगम ( 1844-1868) के दौर में 1854 में पुलिस महकमे की स्थापना हुई, जिसे नवाब शाहजहां बेगम (1868 – 1901) के समय विस्तार मिला। भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 भले ही सीधे लागू नहीं हुआ, लेकिन उसकी प्रशासनिक सोच और अनुशासन की छाया स्पष्ट रूप से दिखाई दी। राजस्व, न्याय और पुलिस व्यवस्था में क्रम और स्पष्टता आई।
विरासत से वर्तमान तक
भोपाल रियासत के भारत संघ शासन में विलय और मध्य प्रदेश गठन के बाद तो पुलिस नवाबी काल की तुलना में अधिक आधुनिक और संसाधन युक्त हो गई। यह खुशी की बात है कि अब अपनी पुलिस आधुनिक हथियारों, तकनीक, साइबर निगरानी और स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन की बात करती है। ‘अतीत’ में झांकने पर यह साफ हो जाता है कि आज की सशक्त कानून-व्यवस्था अतीत की दूरदर्शी सोच की विरासत है, जिसने भोपाल में नागरिक विश्वास और सुरक्षा की मजबूत नींव रखी।
फेसबुक वाल से साभार

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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