उर्दू ग़ज़ल की नायाब, मुमताज और बेनजीर शख्सियत 
डॉ. बशीर बद्र साहब को सालगिरह मुबारक

उर्दू ग़ज़ल की रूह, लफ़्ज़ों के जादूगर, एहसास की नर्म चादर में ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को पिरोने वाले अज़ीम शायर डॉक्टर बशीर बद्र साहब को उनकी यौमे-पैदाइश पर दिल की गहराइयों से मुबारकबाद। कल 15 फ़रवरी रविवार का दिन अदब की दुनिया के लिए किसी ईद से कम नहीं-क्योंकि यह वही तारीख़ है जब शायरी को एक ऐसा लहजा मिला, जिसने आम आदमी के जज़्बात को ग़ज़ल की ज़ुबान दे दी। वे 90 बरस के हो जाएंगे।
तक़रीबन 12-13 बरस से बीमारी (डिमेंशिया) की गिरफ़्त ने उनकी यादों पर धुंध-सी बिछा दी है, फिर भी उनका कलाम ज़ेहन-ओ-दिल में उसी ताज़गी से महकता है। उनके अहबाब और अहल-ए-ख़ाना इस मौक़े को सादगी से मनाते हैं, मगर दुनिया भर के चाहने वालों के दिलों में जश्न की रौशनी जगमगाती है। दुआ है कि सेहत की बहार लौटे और मुशायरों की महफ़िलें फिर उनकी सदाओं से आबाद हों।
उनकी अहलिया डॉ. राहत बद्र जब उनके अशआर गुनगुनाती हैं तो उनके चेहरे पर शादाबी की हल्की-सी लहर दौड़ जाती है; कभी “वाह-वाह” की धीमी गूंज, तो कभी अधूरा मिसरा पूरा कर देने की मासूम कोशिश-ये मंज़र अदब की दुनिया के लिए किसी नेमत से कम नहीं।
डॉ. बद्र की शायरी में मोहब्बत का पैग़ाम है, रुत बदलती धूप-छांव का एहसास है, शहर की भागती ज़िंदगी की बेचैनी है और मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू भी। उनके लफ़्ज़ सादा होते हुए भी दिल की गहराइयों तक उतर जाते हैं। उन्होंने दर्द को भी इस नफ़ासत से बयान किया कि वह शिकवा नहीं, एहसास बन गया-
“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
और अपनी बीमारी के आलम में करीब 12-13 बरस पहले भी जो कहा, वह दिल को चीर जाता है-
“मेरी हंसी से उदासी के फूल खिलते हैं,
मैं सबके साथ हूं लेकिन जुदा सा लगता हूं।”
उन्हें 1999 में मुल्क के अज़ीम एज़ाज़ पद्मश्री से नवाज़ा गया और साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी उनकी अदबी ख़िदमत का एतराफ़ है। उनकाे कलाम का अंग्रेज़ी और फ़्रेंच ज़ुबानों में भी तरजुमा हुआ-यह उनके फ़न की आलमगीर कबूलियत का सबूत है। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में पैदाइश पाने वाले इस फ़नकार ने स्कूली दिनों से ही शायरी को अपना हमसफ़र बना लिया था। शोहरत की असल शुरुआत उस मशहूर शेर से हुई-
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
कहा जाता है कि जब फिल्मी दुनिया की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने इसे अपने हाथों से लिखकर एक रिसाले को दिया, उसने इसे शाया किया तो यह शेर घर-घर गूंज उठा और डॉ. बद्र का नाम अदब की दुनिया में चमकने लगा।
1969 में  अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट रहे डॉ. बशीर बद्र तालीम में भी अव्वल थे। उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी और अवधी पर उनकी गहरी पकड़ थी। दिलचस्प बात यह कि जब वह एम.ए. के स्टूडेंट थे, उसी वक़्त उनका कलाम पाठ्यक्रम में शामिल था-यह एज़ाज़ बिरले नसीबों को मिलता है।
1987 में मेरठ के फ़सादात में उनका आशियाना जलाया गया। यह हादसा उनके दिल पर गहरा ज़ख़्म बनकर रहा। उसी दर्द से यह शेर जन्मा-
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
भोपाल की अदबी फ़िज़ा उन्हें ऐसी रास आई कि यहीं अपना बसेरा बना लिया। उनकी मौजूदगी कभी मुशायरों की कामयाबी की ज़मानत समझी जाती थी। उनका तरन्नुम, उनका अंदाज़-महफ़िल को झूमने पर मजबूर कर देता था।
उन्होंने बेटियों की अज़मत यूं बयान की-
“वो शाख़ है न फूल अगर तितलियां न हों,
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों।”
और शोहरत की नापायदारी पर यूं नसीहत की-
“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।”
उनकी शायरी रिवायत से जुड़ी भी है और उससे आगे बढ़कर नई बस्तियां आबाद करने का हौसला भी रखती है। उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी की ज़ुबान दी, न भारी-भरकम अल्फ़ाज़, न तकल्लुफ़; बस दिल से निकली हुई सादा, मगर असरदार बात।
आज जब हम उनकी सालगिरह के मौक़े पर उन्हें याद करते हैं, तो दुआ करते हैं कि रब-ए-करीम उन्हें सेहत की पूरी बहार अता करे। अदबी महफ़िलें फिर उनकी आवाज़ से महकें और हम-आप एक बार फिर उसी जादू-ए-बयान में डूब सकें।
आमीन।– अलीम बजमी, भोपाल।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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