Bhopal : इकबाल (खिरनी) मैदान जहां इतिहास आज भी टहलता है

अलीम बजमी
भोपाल। पुराने भोपाल की गलियों में अगर आप थोड़ा ठहरकर सुनें, तो आपको इतिहास की आहट महसूस होगी। इस इतिहास की सबसे गूंजती जगह है इकबाल मैदान, जिसे कभी खिरनी वाला मैदान कहा जाता था।
यह कोई साधारण मैदान नहीं, बल्कि भोपाल की रियासत, नवाबी शान, शायरी की महफिलों और लोकतंत्र की आवाज़ों का जीवित गवाह है। राजशाही से लोकशाही तक का सफर इसने अपनी आंखों से देखा है। कभी यहां जुलूसों की रौनक थी, कभी शायरों की आवाज़ें फिज़ा में घुलती थीं, तो कभी बड़े नेताओं की तकरीरों के दौरान नारे गूंजते थे तो इंकलाबी तकरीरों पर तालियां बजती थीं।
चार दरवाज़ों की कहानी
कभी इस मैदान के चार विशाल दरवाज़े थे-हर दरवाज़ा नवाबी दौर की याद समेटे। सीढ़ी घाट की ओर बाब-ए-सिकंदरी, मस्जिद की तरफ बाब-ए-कुदसी, शीश महल के पास बाब-ए-शाहजहांनी और शौकत महल की ओर बाब-ए-सुलतानी। सदर मंज़िल की दिशा में बाब-ए-अहमदी आज भी खड़ा है।समय की मार ने दो दरवाज़ों को 1974-75 की बारिश में ढहा दिया, लेकिन उनकी कहानियां आज भी हवा में तैरती हैं।
मैदान के आसपास मौजूद इमारतें शौकत महल, सदर मंज़िल, जीनत महल और शीश महल-इतिहास की किताबों के पन्नों जैसी लगती हैं। इनकी बनावट में फ्रेंच अंदाज़ है, इंडो-इस्लामिक छाप है और पर्शियन नज़ाकत की झलक है। सैलानी यहां सिर्फ इमारतें देखने नहीं आते, वे बीते वक्त को महसूस करने आते हैं।
जब लगता था जन दरबार
यह वही मैदान है जहां 1819 से 1837 के बीच नवाब कुदसिया बेगम जन दरबार लगाया करती थीं। लोग अपनी फरियाद लेकर आते, और बेगम खुद सुनतीं। सोचिए, एक शासक और जनता के बीच इतनी सीधी बातचीत!
खिरनी वाला…
तब यहां खिरनी के कई पेड़ थे। एक बगीचा लहलहाता था। आज बस एक खिरनी का पेड़ बचा है-हैरिटेज ट्री के रूप में, जो मैदान के बीचोंबीच खड़ा होकर अतीत की कहानी कहता है।
नवाबी दौर की रौनक
नवाब सिकंदर जहां के समय इस मैदान को संवारने का काम हुआ। बगीचे सजाए गए, मैदान को नया रूप मिला। कहते हैं कि दोस्त मोहम्मद खां ने फतेहगढ़ किले के निर्माण के दौरान यहां पौधरोपण कराया था। ये भी जान लीजिये कि शौकत महल में सिकंदर जहां बेगम और बाद में सुल्तान जहां बेगम रहीं। तब यह मैदान महलों का बाहरी आंगन जैसा था-जहां से शाही सवारी निकलती, शाही मेहमानों का स्वागत होता था।
खिरनी से बना इकबाल मैदान
1984 में इस मैदान का नाम बदला गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इसे इकबाल मैदान नाम दिया। वजह थी महान शायर अल्लामा इकबाल का भोपाल से जुड़ाव होना। 1931 से 1936 के बीच वे यहां चार बार आए, शायरी की। कहा जाता है कि उनकी 14 मशहूर नज़्में भोपाल में ही लिखी गईं। वैसे ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा’ जैसी अमर रचना ने पूरे देश में नई चेतना जगाई।1986 में तत्कालीन सीएम मोतीलाल वोरा ने इकबाल मैदान का लोकार्पण किया था। इसके बाद बीडीए और फिर एमपीटी ने इसे संवारा।
जलसों से सन्नाटे तक
यह मैदान कभी शहर की धड़कन था। यहां राजनीतिक जुलूस- जलसे हुए, सांस्कृतिक कार्यक्रम सजे, बड़े शायरों ने अपना-अपना कलाम सुनाया। ख्यातिलब्ध कवियों ने रचनाएं पढ़ी।फिल्मों और धारावाहिकों की शूटिंग भी हुई।
बेसमेंट में लाइब्रेरी
1907 में पास की सदर मंज़िल में मजलिस-ए-इंतजामिया का दफ्तर था, जो बाद में म्युनिसिपलिटी बना। 2013-14 में नगर निगम का मुख्यालय यहां से हट गया, लेकिन बेसमेंट की इकबाल लाइब्रेरी आज भी शब्दों की खुशबू समेटे है।
अब आयोजनों पर रोक
कोरोना काल के बाद मैदान में आयोजनों पर रोक लग गई। अब यहां दिन में बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई देती है, शाम को बुजुर्ग टहलते नजर आते हैं। बाकी समय सन्नाटा पसरा रहता है,पर यह सन्नाटा भी बोलता है।
फेसबुक वाल से साभार





