( अमिताभ पाण्डेय )
भोपाल। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा राजगढ़ के द्वारा शायरी और कविताओं के शौकीन सुनकारों के लिए महफ़िल सजाई गई । सिलसिला के तहत हुए इस आयोजन में 23 मार्च, 2025 को राधा रेस्टोरेंट, राजगढ़ रोड, ब्यावरा में शायरों और कवियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस महफिल का आगाज
उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने अपने संबोधन से किया। उन्होंने कार्यक्रम की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा राजगढ़ जिले के ब्यावरा शहर में आयोजित साहित्यिक श्रृंखला “सिलसिला” को
विख्यात शायर इक़बाल हुसैन क़ादरी के नाम पर समर्पित किया गया है है।
जनाब कादरी जी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व सामाजिक समरसता का प्रतीक था।
डा मेहंदी ने कहा कि उर्दू अकादमी प्रदेश में अपने कार्यक्रमों को प्रतिष्ठित साहित्यकारों, शायरों, कलाकारों या समाज के प्रति योगदान देने वाले व्यक्तियों को समर्पित कर
विभिन्न शहरों में लगातार आयोजन कर रही है।
इसका उद्देश्य साहित्यकारों को सम्मान देना और उनकी विरासत को सहेजना है। हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी उनके कामों से प्रेरणा ले।
इस अवसर पर राजगढ़ ज़िले के समन्वयक युवा कवि राहुल कुम्भकार ने बताया कि सिलसिला के तहत सुबह 11:00 बजे व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता के.के. क़ुरैशी नाज़ां ने की ।
विशिष्ट अतिथि के रूप में भोपाल से शायर शोएब अली ख़ान एवं इक़बाल हुसैन क़ादरी की पोती डॉ सायमा उपस्थित रहे। कार्यक्रम के प्रारम्भ में के के क़ुरैशी नाज़ां ने प्रसिद्ध शायर इक़बाल हुसैन क़ादरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाल कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
के के क़ुरैशी नाज़ां ने कहा कि इक़बाल हुसैन क़ादरी ज़िले के वरिष्ठ शायर रहे हैं, पुलिस जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग में सेवाएँ प्रदान की हैं। उनके अशआर दूर दूर तक मशहूर थे। फ़िल्म इंडस्ट्री में भी गीत लिखने के लिये उन्हें मुम्बई में बुलाया गया था। लेकिन सूफ़ी परम्परा से सम्बद्ध होने के कारण उन्होंने इसे ठुकरा दिया ।
कार्यक्रम में भोपाल से आये विशेष आमंत्रित शायर शोएब अली ख़ान ने अपना कलाम पेश किया। उनके इस शेर की बड़ी तारीफ हुई:
जिस्म खा जाएगी ज़मीं इक दिन
यूँ अकड़ कर चला नहीं करते
रचना पाठ में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उनके नाम और अशआर निम्न हैं :
पढ़ता जाता हूँ यूँ अशआर तेरी नज़रों से
पाके तकरार का इसरार तेरी नज़रों से
– के के क़ुरैशी नाज़ां
इससे पहले कि कोई रंग बग़ावत कर दे
ज़िंदगी आ तेरी तस्वीर मुकम्मल कर दूं
– साजिद हाशमी
माँ ने सिखाया बेटा खुशहाल होके जीना
दीनों की दुआएँ लेना दुखियों के आँसू पीना
– अरुण आज़ाद
यार मिलते ही गाली देते हैं,
क्या अनोखा सलाम है वो भी
– श्याम बाबू खरे
दूर जबसे हुए हो तभी से
नीर आंखों में खारा रहा है
– कन्हैया राज
गांठ मैंने बांध ली थी ख़ुदकुशी के वास्ते
फिर यकायक ध्यान आया एक रस्ता और है
– सत्येंद्र भारिल्ल
फ़र्ज़ इंसानियत का कुछ इस तरह अदा करें
उठाओ हाथ हम सब अमन की दुआ करें
– सख़ावत अंसारी
न जाने क्यूं हमें यूं ऐसा इतराना नहीं आता,
किसी के क़दमों के आगे यूं गिर जाना नहीं आता।
– शाहिद सैफ़ी अश्क
हाले दिल कहने को उनसे किस क़दर बेचैन
सामना होते ही लेकिन जाने क्यों घबरा गए
– इश्तियाक़ ज़ैदी
मैं कहता हूॅं ग़ज़ल अच्छी मगर मुझको नहीं भाता ,
कि कोई प्यार से भी मुझको बोले मीर या ग़ालिब ।।
– डॉ हीरालाल प्रजापति
जामें उल्फ़त पिलाके मानूँगा।
दिल से हर दिल मिला के मानूँगा
ज़ुल्मों नफ़रत की सभी दीवारें ।
जैसे भी हो गिराके मानूँगा।
– डॉ.शैलेंद्र कुमार मेवाडे “बिस्मिल”
जब मैं ऊला और वो सानी हो गया
एक उम्दा शेर यानी हो गया
– राहुल कुम्भकार
मुमकिन है तेरा लम्स नई जान फूँक दे
तू आइयो जनाज़े में मिट्टी ना दीजियो
– राहुल शर्मा ‘राहिल राजगढ़ी’
निकम्मा आलसी पागल दिवाना मतलबी झूटा
मोहब्बत में तेरे ख़ातिर सभी ताने सुने हमने
– मनीष गोस्वामी
सारे बन्धन तोड़ के देखो
हमसे रिश्ता जोड़ के देखो
– कुंवर प्रजापति
कार्यक्रम का सफ़ल संचालन सत्येन्द्र भारिल्ल द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के अंत में ज़िला समन्वयक राहुल कुम्भकार ने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
उर्दू अकादमी के सहयोग से ब्यावरा में जमी यह महफ़िल शानदार, यादगार बन गई।
Source : Agency
