Trade: चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पहली बार 9.5 लाख करोड़ रुपये के करीब

नई दिल्ली। भारत का निर्यात भले ही हाल के महीनों में अच्छी वृद्धि दर्ज कर रहा हो, लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटे ने एक नया और चिंताजनक रिकॉर्ड बना दिया है। चालू वित्त वर्ष खत्म होने में अभी एक महीना बाकी होने के बावजूद, अप्रैल-फरवरी की अवधि के दौरान यह घाटा पहली बार 100 अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया है।

अप्रैल-फरवरी के दौरान चीन के साथ व्यापार घाटा 102 अरब डॉलर (करीब 9,42,492 करोड़ रुपये) हो गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 91.1 अरब डॉलर (करीब 8,41,775 करोड़ रुपये) था. हालांकि, आयात का आधार इतना बड़ा है कि इसमें महज 15% की वृद्धि होने से कुल आयात लगभग 120 अरब डॉलर तक जा पहुंचा, जिसने घाटे की इस खाई को और चौड़ा कर दिया है।

भारत और चीन के बीच व्यापार में भारी असंतुलन का बड़ा कारण क्या?
एक तरफ भारत अपनी विनिर्माण जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीन के कच्चे पर निर्भर है, वहीं दूसरी तरफ चीन ने अपने देश में संरक्षणवादी नीतियां अपनाई हुई हैं। कई अपीलों के बावजूद, चीन कड़े निरीक्षण और मानकों का हवाला देकर भारतीय उत्पादों की अपने बाजार में एंट्री को प्रतिबंधित करता है, जिससे व्यापार एकतरफा हो गया है।

क्या इस व्यापारिक स्थिति के बीच विदेशी निवेश नियमों में बदलाव किया गया?
जी हां, भारत सरकार की ओर से निवेश के मोर्चे पर भी एक नीतिगत कदम उठाया गया है। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) ने सोमवार को एफडीआई नीति (एफडीआई नीति) में बदलावों को अधिसूचित किया है। नए नियमों के तहत, अब 10% तक चीनी शेयरधारिता वाली विदेशी कंपनियों को ‘ऑटोमैटिक रूट’ के माध्यम से भारत में निवेश करने की अनुमति मिल गई है।

चीन के साथ 102 अरब डॉलर का व्यापार घाटा यह साफ करता है कि घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बावजूद, भारतीय सप्लाई चेन आज भी बुनियादी कच्चे माल के लिए चीनी आयात पर निर्भर है। स्मार्टफोन और पेट्रोलियम निर्यात में भारी उछाल सकारात्मक संकेत है, लेकिन आयात-निर्यात के अंतर को कम करने के लिए भारत को कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर आक्रामक रूप से काम करना होगा। इसके अतिरिक्त, चीनी निवेश के लिए एफडीआई नियमों में ढील देना भविष्य में घरेलू उत्पादन क्षमता को पूंजीगत समर्थन देने की एक अहम रणनीतिक पहल साबित हो सकती है।

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