MP : 5 करोड़ में बनवाया था जो पावर स्टेशन, उसकी मरम्मत पर सरकार खर्च करेगी 465 करोड़

भोपाल। प्रदेश के बिजली महकमे में इन दिनों एक ऐसा आंकड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है जिसे सुनकर कोई भी माथा पीट ले। जिस गांधी सागर हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन को 1960 के दशक में महज 4.8 करोड़ रुपये की लागत से खड़ा किया गया था, अब उसकी मरम्मत के लिए सरकार 465 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट झोंकने जा रही है। मध्य प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन ने इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है, लेकिन इस फैसले ने विकास से ज्यादा विनाश की आशंकाओं को जन्म दे दिया है।
आजादी के बाद चंबल घाटी परियोजना के तहत बने इस प्लांट का उद्घाटन खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। MP Genco ने रेगुलेटर को दी अपनी दलील में साफ कहा है कि इस पावर स्टेशन की पांचों यूनिट्स अपनी 40 साल की वर्किंग लाइफ और 50 साल की ऑपरेशनल लाइफ बहुत पहले ही पूरी कर चुकी हैं। हद तो तब हो गई जब 2019 की भीषण बाढ़ में पानी पावर हाउस के भीतर घुस गया और 132 kV के स्विचयार्ड तक पहुंच गया, जिससे पूरा प्लांट मलबे और बर्बादी की भेंट चढ़ गया था। सवाल यह है कि जो ढांचा प्रकृति का एक वार नहीं झेल पाया, उस पर करोड़ों का दांव लगाना कितना सही है?
CAG ने पहले ही दी चेतावनी
करोड़ों के इस रिन्यूअल प्रोजेक्ट के बीच सबसे डरावना पहलू बांध की सुरक्षा है। दिसंबर 2021 की CAG रिपोर्ट ने साफ चेतावनी दी थी कि इस बांध के स्पिलवे की क्षमता 4.86 लाख क्यूसेक पानी झेलने की है, लेकिन कई बार पानी का बहाव इस सीमा को लांघ चुका है। रिपोर्ट में सीधे तौर पर कहा गया है कि अगर गांधी सागर बांध के बुनियादी ढांचे में कोई बड़ी दरार आती है या यह टूटता है, तो निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए यह विनाशकारी साबित होगा।
जान बचाएं या बिजली घर?
रिटायर्ड एडिशनल चीफ इंजीनियर राजेंद्र अग्रवाल जैसे जानकारों का कहना है कि प्राथमिकताएं गलत तय की जा रही हैं। उनके मुताबिक, मुख्य मुद्दा बांध की उन संरचनात्मक कमियों को दूर करना होना चाहिए जिनकी ओर CAG ने इशारा किया है। बिजली घर को चमकाने से पहले बांध की मजबूती जरूरी है क्योंकि मामला लाखों लोगों की जान से जुड़ा है।





