MP : केन बेतवा लिंक परियोजना का विरोध, सड़क पर उतरी महिलाएं, पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, कई लोग लापता..

भोपाल। छतरपुर जिले में केन बेतवा लिंक परियोजना का विरोध तेज हो गया है। इसे लेकर महिलाएं सड़क पर आ गई हैँ। पुलिस ने ग्रामीणों को खदेड़ने के लिए रात के अंधेरे में लाठी चार्ज और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, मगर ग्रामीण अपनी मांग पर डटे हुए हैं।
छतरपुर जिले के पालकुआं गांव की रहने वाली मनोहर बाई की आंखों में पुलिस का खौफ साफ नजर आ रहा है, वो बताती हैँ – पुलिस ने रात 11.30 बजे लाठीचार्ज किया, हम लोग बैठे रहे। इसके बाद 1 बजे वाटर कैनन चलाया। महिलाएं, बच्चे सब भीग गए। रात 2 बजे हमें फिर खदेड़ना शुरू किया। बहुत मारा। हम लोग डर के मारे इधर-उधर भागते रहे। 20 किमी तक दौड़े। अब तक कई लोग मिले नहीं है, पता नहीं वे कहां हैं?
मनोहर बाई का गांव उन 20 से ज्यादा गांवों में शामिल है जो दौधन बांध के डूब क्षेत्र में आ रहा है। ये बांध केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। मनोहर बाई अकेली नहीं हैं।
पालकुआं गांव से आईं गुलाब बाई का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। वह कहती हैं कि हमें हमारे गांव से भगाया जा रहा है। हमारे खेत-खलिहान सब हमसे छूट रहे हैं। इसके बदले में सरकार हमें सिर्फ 12 लाख रुपए दे रही है। बताइए, इतने में क्या हमारे बाल-बच्चे पल जाएंगे? क्या हमारा घर बन जाएगा? क्या हम जमीन ले पाएंगे? कैसे जिएंगे, कहां जाएंगे, हमें कुछ नहीं पता।
ग्रामीणों को 12 लाख रुपए देकर भगाया जा रहा
दरअसल, केन बेतवा लिंक परियोजना के पहले चरण में दौधन गांव में एक बांध बनाया जा रहा है। बांध बनने के बाद इसके डूब क्षेत्र में 20 से ज्यादा गांव आ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने एक नया गांव बसाने का भरोसा दिया था, जहां सारी सुविधाएं होने का दावा किया था, लेकिन अब 12 लाख रुपए देकर टरकाया जा रहा है।
पुलिस ने ग्रामीणों के मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को भी गिरफ्तार किया, जिससे तनाव और ज्यादा बढा। ग्रामीणों ने गिरफ्तारी के खिलाफ बिजावर तहसील मुख्यालय पर धरना शुरू कर दिया।
कैसे शुरू हुआ विवाद और क्यों भड़का गुस्सा?
यह पूरा विवाद 6 फरवरी को शुरू हुआ, जब परियोजना से प्रभावित महिलाओं ने दौधन बांध का काम यह कहते हुए रुकवा दिया कि जब तक उनकी मांगों के अनुसार मुआवजा नहीं मिलेगा, वे काम शुरू नहीं होने देंगी। महिलाओं का आरोप है कि सरकार उन्हें बिना उचित पुनर्वास और मुआवजे के उनकी जमीन से बेदखल करना चाहती है।
इस घटना के तीन दिन बाद, 9 फरवरी को पुलिस ने इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को बिजावर स्थित उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। अमित भटनागर लंबे समय से केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।
पुलिस ने शुरू में कहा कि उन्हें केवल पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा है, लेकिन बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया। अपने नेता की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही 20 से ज्यादा गांवों के लोग आक्रोशित हो गए। 10 फरवरी को, हजारों की संख्या में लोग, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं, बिजावर ब्लॉक मुख्यालय पहुंचे और तहसील कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गए।
10-11 फरवरी की रात, पार्षद ने बताई आंखों देखी
बिजावर से पार्षद दिव्या अहिरवार, जो शुरू से ही इस आंदोलन से जुड़ी हुई हैं, वह बताती हैं कि 0 फरवरी को दोपहर लगभग 3 बजे से हम रैली निकालते हुए तहसील कार्यालय पहुंचे। हमने प्रशासन से बात करने की कोशिश की और उन्हें एक घंटे का समय दिया कि वे अमित भटनागर को रिहा करें। जब एक घंटे बाद भी कोई जवाब नहीं आया, तो हम वहीं शांतिपूर्ण धरने पर बैठ गए।
प्रशासन ने आश्वासन दिया था कि अमित को सुबह छोड़ दिया जाएगा, जिसके बाद ग्रामीणों ने सुबह तक वहीं रुकने का फैसला किया, लेकिन रात 11 बजे के करीब अचानक प्रशासन ने लाठीचार्ज कर दिया। हम जैसे-तैसे संभलकर वापस बैठे। फिर रात 12 बजे पुलिस ने वाटर कैनन चलाया, जिससे महिलाएं और बच्चे पूरी तरह भीग गए।
इस दौरान दो-तीन महिलाओं ने गुस्से में वॉटर कैनन पर पत्थर फेंके, लेकिन हमने उन्हें तुरंत शांत करा दिया। गीले होने के बावजूद हम ठंड में वहीं बैठे रहे। रात 2 बजे पुलिस फिर से आई और जगह खाली करने की धमकी दी। मैं खुद पुलिस अधिकारियों से बात करने गई। उनसे कहा कि हम शांतिपूर्ण तरीके से सुबह तक बैठे रहेंगे, इतनी रात में कहां जाएंगे?
पुलिसवालों ने मां-बहन की गालियां दीं
दिव्या बताती है कि पुरुष पुलिसकर्मियों ने औरतों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा। हम वहां से भागकर 500 मीटर दूर एक मंदिर परिसर में इकट्ठा हुए, लेकिन पुलिस वहां भी आ गई और हमें 20 किलोमीटर दूर तक खदेड़ती रही। मैं खुद सुबह 5 बजे एक सुरक्षित जगह पहुंच पाई।
पुलिस ने हम आदिवासी, दलित महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे हम कोई अपराधी हों। दुखा रैकवार नाम की एक और महिला ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें मां-बहन की गालियां दीं।मारते-पीटते हुए भगाया।
मुआवजे पर भ्रम और सरकार पर अविश्वास
डूब प्रभावित गांवों में सरकार के प्रति गहरा अविश्वास है। गौरीशंकर यादव बताते हैं, जब से डूब की बात सामने आई है, हमें कभी कोई सही जानकारी नहीं दी गई। शुरू में कुछ अधिकारी आए और कहा कि हमें एक नए गांव में बसाया जाएगा जहां स्कूल, बिजली, पानी सब कुछ होगा। लेकिन अब वे बस 12 लाख रुपए देकर हमें भगाना चाहते हैं।
वह मुआवजे के आकलन पर भी सवाल उठाते हैं, कहते हैं हमें इनका हिसाब ही समझ नहीं आता। किसी के घर का 30 हजार रुपए मुआवजा दे रहे हैं, तो किसी का एक लाख। हम तीन भाई हैं, तीनों के घर एक जैसे हैं, लेकिन तीनों के घरों की कीमत अलग-अलग आंकी गई है। यह कैसे हो रहा है, कोई बताने को तैयार नहीं।
ग्रामीणों की मांग है कि प्रति व्यक्ति 25 लाख रुपए दिए जाएं। हमारे घर, जमीन और बाकी संपत्ति का आज के बाजार भाव के हिसाब से मूल्यांकन हो और उसी के अनुसार हमें भुगतान किया जाए। 12 लाख में हम क्या करेंगे? जमीन लेंगे, घर बनाएंगे या कोई काम-धंधा शुरू करेंगे?
मामले पर राजनीति और प्रशासन का पक्ष
मामले ने अब राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। छतरपुर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष गगन यादव बांध स्थल पर ग्रामीणों से मिलने पहुंचे। उनकी बात कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से कराई। गगन यादव ने कहा, यह आंदोलन बांध के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार द्वारा किए गए अधूरे वादों के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि यहां के एसडीएम शासन तक गलत जानकारी पहुंचा रहे हैं। जब लोग अपने नेता की रिहाई के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, तो रात में महिलाओं और बच्चों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया गया।
प्रदर्शनकारी शाम में उग्र हो गए थे
वहीं, प्रशासन ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराया है। एसडीओपी अजय रिथोरिया ने बताया, प्रदर्शनकारी शाम में उग्र हो गए और घेराव का प्रयास कर रहे थे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग किया गया। हमने वीडियो फुटेज के आधार पर लोगों की पहचान शुरू कर दी है और कानून व्यवस्था बिगाड़ने वालों पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।





