MP हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘वर्दी कानून की, लेकिन दिल अपराधियों के साथ’, DGP को एक महीने में सर्कुलर जारी करने का आदेश

ग्वालियर। मध्य प्रदेश में पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी कानून लागू करने के बजाय अपनी लापरवाही या जानबूझकर की गई कार्रवाई से अपराधियों को कानूनी लाभ दिला रहे हैं। इसी के साथ कोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों के लिए सख्त चेतावनी वाला सर्कुलर जारी किया जाए।
कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?
जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसकी गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं दिए जाते, तो इसे केवल प्रक्रिया संबंधी गलती नहीं माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में यह माना जा सकता है कि संबंधित अधिकारी ने आरोपी को अदालत से राहत दिलाने के उद्देश्य से जानबूझकर ऐसा किया।
कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “कुछ पुलिस अधिकारी वर्दी तो कानून की पहनते हैं, लेकिन उनका दिल अपराधियों के साथ धड़कता है।”
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन पर सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस मुख्यालय भोपाल ने 13 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में आवश्यक सर्कुलर जारी किया था, लेकिन कई थानों में जांच अधिकारी अब भी गिरफ्तारी के दौरान अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं। इससे आरोपी तकनीकी आधार पर अदालत से राहत पाने में सफल हो सकते हैं, जो न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
किस मामले में हुई सुनवाई?
यह टिप्पणी धर्मेंद्र लोधी की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। याचिका में दावा किया गया था कि दतिया जिले के बसई थाना क्षेत्र में एनडीपीएस एक्ट के मामले में गिरफ्तार उनके भाई को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप से नहीं बताए गए।
हालांकि, रिकॉर्ड की जांच में अदालत ने पाया कि पुलिस ने आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के तहत आवश्यक लिखित नोटिस दिया था और उसके कब्जे से 86.850 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ था। इस आधार पर कोर्ट ने गिरफ्तारी को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।
आदेश के प्रमुख बिंदु
गिरफ्तारी के समय आरोपी को उसके गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है।
इस प्रक्रिया का पालन न करना गंभीर कर्तव्यहीनता माना जाएगा।
DGP को एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों के लिए सख्त निर्देश जारी करने होंगे।
अदालत ने संकेत दिया कि जानबूझकर ऐसी चूक करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी आवश्यक है।
यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया का पालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। अदालत ने पुलिस अधिकारियों को चेताया है कि प्रक्रिया संबंधी लापरवाही के कारण अपराधियों को मिलने वाला लाभ अब गंभीर जवाबदेही का विषय माना जाएगा।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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