MP: कैग की रिपोर्ट में सामने आया आईटी पार्क घोटाला…कॉल सेंटर की जगह नर्सिंग कॉलेज, केवल 4% रोजगार, लघु उद्योग निगम ने ठेकेदारों को बांटे ढाई करोड़ रुपए

भोपाल। मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम लिमिटेड ने आईटी पार्कों में संस्थानों को भूखंड और स्थान तो आवंटित कर दिए, लेकिन वो क्या कर रहे हैं इसकी मॉनिटरिंग का कोई सिस्टम डेवलप नहीं किया, लिहाजा जिस संस्थान को कॉल सेंटर संचालित करना था वो नर्सिंग कॉलेज चलाता मिला।इसी तरह मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम लिमिटेड ने ठेकेदारों से रॉयल्टी के उचित दस्तावेज हासिल किए बिना 2.79 करोड़ रुपए जारी कर दिए। नियम के मुताबिक ठेकेदारों से नो ड्यूज सर्टिफिकेट हासिल करना था। इन गड़बड़ियों का खुलासा कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया यानी CAG की रिपोर्ट में हुआ है।

सीएजी ने मप्र के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (स्टेट पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज) पर अपनी रिपोर्ट पेश की है। 31 मार्च 2023 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष के लिए पेश की गई इस रिपोर्ट में सीएजी ने मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम लिमिटेड, मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम लिमिटेड की कार्यप्रणाली को शामिल किया। वहीं रिन्युएबल एनर्जी के डेवलपमेंट और विद्युत वितरण कंपनियों के विद्युत विकास योजना में हुई आर्थिक अनियमितताओं के बारे में बताया है। साथ ही राज्य सरकार को सिफारिश भी की है।

लॉन्ग टर्म स्ट्रैटजी तैयार नहीं की
कैग ने पाया कि एमपी स्टेट इलेक्ट्रॉनिक डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन( MPSEDC) ने आईटी पार्कों के लिए कोई लॉन्ग टर्म स्ट्रैटजी तैयार नहीं की। इसकी वजह से जिन संस्थाओं को आईटी पार्क की जमीन या स्थान दिए गए थे, उनके लिए कोई टारगेट सेट नहीं था। इसकी वजह से चारों आईटी पार्क, भोपाल, इंदौर (सिंहासा और परदेशीपुरा), जबलपुर और ग्वालियर में एक समान विकास नहीं हुआ।ग्वालियर में भूखंडों का डेवलपमेंट शुरू नहीं हुआ तो बाकी तीन जगहों पर जो भूखंड आवंटित किए गए उनमें से कुछ पर ही कॉमर्शियल एक्टिविटी शुरू हो सकी।

आईटी पार्क से केवल 4 फीसदी रोजगार
कैग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि आईटी पार्क के जरिए सरकार रोजगार की संभावनाएं बढ़ाने में पूरी तरह से नाकाम रही है। सरकार ने आईटी पार्क की जितनी जमीन उपलब्ध कराई उसके हिसाब से 15 हजार लोगों को रोजगार मिलना था, लेकिन सिर्फ 576 को ही मिला। इतना ही नहीं, भूखंडों के आवंटन की प्रक्रिया में भी कई कमियां पाई गई।

जमीन के स्वामित्व को लेकर एक शैक्षणिक संस्थान के साथ विवाद के कारण जून 2022 में 11 भूखंडों के पट्‌टे समझौते रद्द कर दिए गए।
विवादित भूखंडों का विकास और आवंटन नहीं हो पाया। जिसके परिणाम स्वरुप व्यवसाय गतिविधियां शुरू नहीं होने के कारण रोजगार सृजन प्रक्रिया प्रभावित हुई।
पट्टे के समझौते विभिन्न कारणों से आठ मामलों में या तो रद्द कर दिए गए या वापस ले लिए गए। ये भूखंड 2 साल से खाली पड़े हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि व्यवसायिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए सक्रिय रूप से भूखंडों को आवंटित करने के लिए विभाग की ओर से प्रयास की कमी दर्शाता है। इन 19 भूखंडों को छोड़ दे तो वास्तव में आवंटित 240 भूखंडों के संबंध में सृजन रोजगार का लक्ष्य 14,548 था। जिसके विरुद्ध 576 यानी 3.96 प्रतिशत रही।खासबात यह है कि 240 भूखंडों में से 123 के संबंध में आवंटन की अवधि 3 साल से अधिक हो गई है लेकिन उत्पादन शुरू नहीं हुआ।

भोपाल–इंदौर आईटी पार्क की 13.57 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भोपाल और इंदौर के आईटी पार्क की 13.57 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। इससे सरकार को 2.28 करोड़ रुपए राजस्व का नुकसान हुआ। इसके अलावा सरकार को इस जमीन काे विकसित करने में खर्च हुए 3.62 करोड़ रुपए का नुकसान भी हुआ। कैग ने जब अतिक्रमण हटाने के प्रयासों के बारे में पूछा तो निगम ने कोई जवाब नहीं दिया।
10 सालों तक विकास शुल्क में बदलाव नहीं किया
एमपीएसईडीसी ने 10 साल (2013 से 2023 ) तक विकास शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया। जबकि निगम इसे समय–समय पर संशोधित करने के लिए सक्षम था। ऐसे में विकास शुल्क के तौर पर 10 साल पुराने रेट पर केवल 42.86 करोड़ रुपए की वसूली हुई। जबकि विकास व्यय 228.10 करोड़ रुपए था।

गैर आईटी कंपनियों को दे दी जमीन
भोपाल, इंदौर और जबलपुर के आईटी पार्कों में 20 यूनिट्स में से 11 ऐसी हैं, जो आईटी सेक्टर की श्रेणी में नहीं आती हैं। निगम ने इस फर्म पर कोई कार्रवाई करना तो दूर इन्हें 4 करोड़ रुपए की जमीन सब्सिडी और करीब 61 लाख रुपए प्रोत्साहन राशि सहायता प्रदान कर दी।

रिपोर्ट के मुताबिक जबलपुर आईटी पार्क स्थित मैसर्स सैफरॉन सौलर सिस्टम नाम की फर्म को 2926 में एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। इसके एग्रीमेंट के मुताबिक फर्म को पीवी सौर पैनल्स और मॉड्यूल्स का निर्माण करना था। फर्म ने तीन साल तक यहां काम शुरू नहीं किया तो 2022 में जमीन आवंटन रद्द कर दिया गया। लेकिन कुछ दस्तावेजों व मशीनरी की सूची प्रस्तुत करने पर फर्म को जमीन फिर से लौटा दी।
खास बात यह है कि फर्म ने जो उपकरणों की जो सूची प्रस्तुत की थी, उसमें सोल्डरिंग आयरन, ड्रिल, कटर्स और वजन तौलने वाली मशीन शामिल थी। जबकि इन उपकरणों का पीवी सौर पैनल्स और मॉड्यूल्स का निर्माण में उपयोग ही नहीं होता। इस फर्म को निगम ने 60.73 लाख की सब्सिडी भी दी गई थी।

इसी तरह भोपाल में मैसर्स ग्रीन सर्फर को 2028 में एलईडी लाइट्स इलेक्ट्रानिक प्रोडक्ट तैयार करना था, लेकिन जांच पाया गया कि यहां केवल बल्बों के पुर्जों का स्टॉक किया जाता है। इस फर्म ने भी सरकार से 1.64 करोड़ की सब्सिडी ली थी।

रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड से 36 करोड़ नहीं वसूले
इसी तरह कैग ने नवीन एंव नवीकरणीय ऊर्जा विकास निगम में भी लापरवाही पाई। रिपोर्ट के मुताबिक निगम ने रीवा सोलर पार्क के लिए अप्रैल 2017 में रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड के साथ एक भूमि उपयोग अनुमति समझौता किया था। निगम ने अप्रैल 2017 में शुरू होने वाले पांच सामान वार्षिक किस्तों में भूमि उपयोग शुल्क की आवश्यकता थी।
निगम ने न तो मांग बढ़ाई गई और न ही समय पर वसूली की। निगम ने सरकारी आदेशों के तहत देरी से भुगतान के लिए 8.6 करोड़ रुपए का ब्याज शुल्क भी नहीं लगाया इसी तरह सोलर पार्क की परियोजनाओं के मामले में निगम मार्च 2023 तक कंपनी से 25.12 करोड़ की भूमि उपयोग शुल्क की वसूली नहीं कर सका ना ही भूमि उपयोग शुल्क के भुगतानों में देरी के लिए 2.65 करोड़ रुपए का ब्याज लगाया गया।

ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दिया ठेका
पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने एक दागी ठेकेदार को लाइन मेंटेनेंस का काम दे दिया। रिपोर्ट के मुताबिक ठेके की शर्त और नियमों के अनुसार कंपनी को ये देखना था कि जो बोली लगा रहा है उसकी तकनीकी और वित्तीय क्षमता कितनी है। यह भी देखना था कि कोई बोली कर्ता के खिलाफ कोई मुकदमा तो नहीं चल रहा है।
मार्च 2017 में मेसर्स मोहम्मद आरिफ शेख और मेसर्स एस हिफाजत अली के संयुक्त कंपनी को ठेका दिया गया था। कैग ने तकनीकी वाणिज्यकर बोली का मूल्यांकन करने पर पाया गया कि ठेकेदार ने बोली आवेदन में लिखा था कि उनकी कपंनी पर कोई मुकदमा नहीं है। जबकि ठेकेदार ने अगस्त 2016 में डीजी केवाई योजना के तहत एग्रीमेंट के लिए बोली लगाते समय तीन पूर्व मुकदमों की जानकारी दी थी।
यह मुकदमे मध्य प्रदेश हाउसिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड, मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी इंदौर और टीडब्ल्यूडी बड़वानी से संबंधित थे।

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