Indore : भागीरथपुरा में मौतों पर हाईकोर्ट बोला- इस घटना से शहर की छवि को देशभर में नुकसान पहुंचा, 38 नए मरीज मिले

इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित जल से हुई मौतों को लेकर एमपी हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई चल रही है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि इस घटना ने शहर की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर है, लेकिन अब दूषित पेयजल की वजह से यह पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है।
कोर्ट ने कहा कि पीने का पानी ही अगर दूषित हो तो यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है। हम इस मामले में मुख्य सचिव को सुनना चाहते हैं, क्योंकि यह समस्या सिर्फ शहर के एक हिस्से तक सीमित नहीं है। दरअसल, पूरे इंदौर शहर का पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। अभी अस्पतालों में 110 मरीज भर्ती हैं। अब तक कुल 421 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती किया जा चुका है। इनमें से 311 मरीज अस्पताल से डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। आईसीयू में 15 मरीजों का इलाज चल रहा है। उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं। इनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो हॉस्पिटल रेफर किया गया है।
याचिकाकर्ता बोले- सप्लाई किया जा रहा पानी पीने लायक नहीं
31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को यह निर्देश दिया था कि नागरिकों को स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। इस पर एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी है कि प्रभावित क्षेत्र में अब भी जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, वह दूषित है, न कि स्वच्छ और पीने योग्य।
समय रहते शिकायतें सुनी होतीं तो ये नौबत नहीं आती
अन्य याचिकाओं में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि इस घटना से पहले ही स्थानीय निवासियों की ओर से कई शिकायतें की गई थीं, लेकिन प्रशासन ने उन पर कोई संज्ञान नहीं लिया। अगर समय रहते इन शिकायतों पर संज्ञान लिया गया होता और उचित रोकथाम के कदम उठाए गए होते तो यह घटना ही नहीं होती।
सीनियर काउंसिल ने यह भी कोर्ट को बताया कि 2022 में महापौर द्वारा पीने के पानी की आपूर्ति के लिए नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन फंड जारी न होने के कारण यह काम अब तक नहीं हो पाया।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं की, जांच हो
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि साल 2017-18 में इंदौर के अलग-अलग इलाकों से पानी के 60 सैंपल लिए गए थे, जिनमें से 59 सैंपल पीने योग्य नहीं पाए गए। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि इस मामले में संबंधित अधिकारी केवल नागरिक (सिविल) जिम्मेदारी के ही नहीं, बल्कि आपराधिक जिम्मेदारी के भी दोषी हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस पूरे मामले की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की है।
हाईकोर्ट ने कहा- जवाब दाखिल कर एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में अपना जवाब दाखिल करें और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है।
कोर्ट में टैंकरों से वाटर सप्लाई के फोटो भी रखे
नगर निगम की ओर से कोर्ट में यह भी बताया गया कि मामला सामने आने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों के जरिए स्वच्छ पेयजल की सप्लाई शुरू की गई। 30 दिसंबर को 36, 31 दिसंबर को 34 और 1 जनवरी को 33 टैंकरों से पानी भेजा गया। टैंकरों से पानी सप्लाई के फोटो भी निगम की ओर से पेश किए गए।्र
स्टेटस रिपोर्ट में कार्रवाई की जानकारी भी दी
स्टेटस रिपोर्ट में बताया गया कि मामले में कार्रवाई की गई है। जोन-4 के जोनल अधिकारी और असिस्टेंट इंजीनियर को सस्पेंड किया गया है। वहीं, सब इंजीनियर की सर्विस खत्म की गई है। इसके बाद हाईकोर्ट ने शासन को डिटेल्ड रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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