Indore : दूषित पानी पर हाई कोर्ट सख्त, कहा – स्वच्छ पेयजल मौलिक अधिकार, मौतों पर सरकार के जवाब को बताया असंवेदनशील,  जरूरत पड़ी तो अफसरों पर तय होगी क्रिमिनल जिम्मेदारी

इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में मंगलवार (6 जनवरी) को दूषित पेयजल से जुड़े मामले पर 4 से 5 याचिकाओं की एक साथ सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस घटना ने इंदौर शहर की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर अब दूषित पानी की वजह से पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इंदौर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में स्वच्छ पानी जनता का मौलिक अधिकार है और इससे किसी भी हाल में समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में आवश्यकता पड़ी तो दोषी अधिकारियों पर सिविल और क्रिमिनल लायबिलिटी भी तय की जाएगी। साथ ही संकेत दिए गए कि अगर पीड़ितों को मुआवजा कम मिला है तो उस पर भी अदालत उचित निर्देश जारी करेगी।
मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश
कोर्ट ने दूषित पानी से प्रभावित मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा इस पूरे मामले में हुई मौतों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की गई है। अगली सुनवाई 15 जनवरी को होगी, जिसमें मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं।

अब तक 17 लोगों की मौत, 421 मरीज अस्पतालों में भर्ती
बताया गया कि दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। फिलहाल 110 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं, जबकि कुल 421 मरीजों को अब तक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनमें से 311 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं। आईसीयू में 15 मरीजों का इलाज जारी है। वहीं उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं, जिनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो अस्पताल रेफर किया गया है।

प्रशासन शिकायतों पर ध्यान देता तो मौतें नहीं होती
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे, लेकिन प्रभावित इलाकों में अब भी दूषित पानी की सप्लाई की जा रही है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि प्रशासन ने पहले की गई शिकायतों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया, यदि ऐसा किया जाता तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती।

सीनियर काउंसिल ने कोर्ट को यह भी बताया कि वर्ष 2022 में महापौर द्वारा नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन फंड जारी न होने के कारण अब तक काम शुरू नहीं हो सका।
इसके अलावा यह भी दलील दी गई कि 2017-18 में इंदौर के विभिन्न क्षेत्रों से लिए गए 60 पानी के सैंपलों में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

नई स्टेटस रिपोर्ट के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिए हैं कि वे इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है और इसकी अनदेखी गंभीर विषय है।

हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े मुद्दों को 7 श्रेणियों में बांटा है…

प्रभावित लोगों के लिए तत्काल और आपात निर्देश।
रोकथाम और सुधारात्मक उपाय।
जिम्मेदारी तय करना।
अनुशासनात्मक कार्रवाई।
मुआवजा।
स्थानीय निकायों को निर्देश।
जन-जागरूकता और पारदर्शिता।
मृतकों के परिजनों से मिले कांग्रेसी, छावनी बना भागीरथपुरा
वहीं दोपहर करीब एक बजे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की अगुआई में कार्यकर्ता भागीरथपुरा पहुंचे। यहां पहले से बड़ी संख्या में पुलिस बल वज्र वाहन सहित तैनात था। भागीरथपुरा घुसने वाले सभी रास्तों को बैरिकेड लगाकर बंद कर दिया गया था। इस दौरान कांग्रेस नेताओं की पुलिस अधिकारियों से बहस भी हुई।
बाद में दूसरे रास्ते से कांग्रेसी अंदर पहुंच गए। वहां मृतक अशोक लाल पवार, जीवन लाल और गीता बाई के घर गए। परिजनों से चर्चा की। इसके बाद करीब 3 बजे भागीरथपुरा से लौट गए। पत्रकारों से बातचीत में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर का प्रभारी मंत्री होने के नाते मुख्यमंत्री मोहन यादव, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और महापौर पुष्यमित्र भार्गव से इस्तीफा मांगा।

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