भोपाल। नगर निगम में बिना काम के फर्जी बिलों से करोड़ों रुपए निकालने मामले में लोकायुक्त की टीम ने नगर निगम में छापेमारी कर रिकॉर्ड जब्त किया है। कार्रवाई एक शिकायत के आधार पर हुई है। शिकायत में आरोप गलाया गया है कि गुणवंत सेवतकर अपरआयुक्त वत्त ने अन्य कर्मचारियों के साथ मिलकर सेप साफ्टवियर की मदद से बिना काम कराए ही फर्जी बिल लगाकर परिचितों और रिश्तेदारों की बनाई फर्मो में बिल लगवाकर करोड़ों का भुगतान कराया। इसके एवज में मोटी रकम कमीशन के रूप में ली।
एसपी दुर्गेश राठौर ने बताया कि शुक्रवार को लोकायुक्त पुलिस की टीम ने नगर निगम के डाटा सेंटर कार्यालय समेत अन्य संबंधित शाखाओं में पहुंचकर दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं। प्रारंभिक जांच में मोटर वर्क शाखा, जल कार्य विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग के कुछ कार्यों में गंभीर अनियमितताओं के मामले सही पाए गए हैं। अब लोकायुक्त पुलिस ने भुगतान के सर्वर का डाटा जब्त कर उसका परीक्षण किया जाएगा। जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट से वारंट प्राप्त करने के बाद कार्रवाई की
लोकायुक्त पुलिस को निगम में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में करोड़ों रुपये के फर्जी भुगतान का आरोप लगाया गया था। लोकायुक्त पुलिस ने शिकायत का प्रारंभिक सत्यापन किया, जिसमें कुछ तथ्य सही पाए जाने के बाद न्यायालय से वारंट प्राप्त किया गया। इसके बाद टीम ने निगम कार्यालय और डाटा सेंटर में छापेमारी की कार्रवाई शुरू की।
दस साल के दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड कब्जे में
छापेमारी के दौरान लोकायुक्त टीम ने पिछले करीब दस वर्षों से जुड़े रिकॉर्ड और फाइलों को अपने कब्जे में लिया है। इसके साथ ही भुगतान से जुड़े एसएपी (SAP) सॉफ्टवेयर का डाटा भी जब्त किया गया है। जांच एजेंसी अब इन दस्तावेजों और डिजिटल डाटा का विश्लेषण कर यह पता लगाएगी कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में वे काम हुए भी थे या नहीं। साथ ही इनमें कौन कौन सी फर्म और अधिकारियों की मिलीभगत थी।
अपर आयुक्त के खिलाफ एफआईआर दर्ज
आरोपी गुणवंत सेवतकर के खिलाफ लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार अधिनियम, अपराधिक षण्यंत्र रचने, कूटरचित दस्तावेज तैयार कर धोखाधड़ी करने की एफआईआर दर्ज की है। फिलहाल उनकी गिरफ्तारी नहीं की जा सकी है। टीम केस की बारीकी से जांच कर रही है। जांच में आए तथ्यों के आधार पर अन्य कर्मचारियों को नामजद किया जाएगा।
जानिए क्या बोले लेखा शाखा के जिम्मेदार
वहीं गुणवंत सेवतकर ने पूरी कर्रावाई को लेकर बताया कि लेखा विभाग को बिलों का सत्यापन किए जाने के बाद देयक प्राप्त होता है। लेखाशाखा में बिलों का देयक प्राप्त होने के बाद फंड की उपलब्धता के आधा पर निगम आयुक्त से चर्चा की जाती है। चर्चा के अनुसार ही आगे बिलों का भुगतान किया जाता है। इसी लिए बिलों का लेखा शाखा में सीधे तौर पर न तो कोई देयक तैयार किया जाता है और न ही भुगतान किया जाता है। हर बिल का भुगतान पूरी प्रक्रिया के बाद ही होता है। लिहाजा सीधे तौर पर लेखा शाखा को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं।
