MP : जनजातीय विश्वविद्यालय में असम के छात्र पर जानलेवा हमला, विश्वविद्यालय प्रबंधन सवालों के घेरे में

अनूपपुर। अनूपपुर के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU) में असम के छात्र से मारपीट और उस पर जानलेवा हमले के बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन सवालों के घेरे में है। दरअसल, ये कोई पहला मौका नहीं है, जब किसी बाहरी राज्य के छात्र के साथ मारपीट की घटना हुई है।
छात्र नेताओं का कहना है कि इससे पहले कश्मीर और राजस्थान के छात्रों के साथ भी मारपीट हो चुकी है, लेकिन डर की वजह से उन्होंने प्रबंधन को शिकायत नहीं की। छात्र नेताओं का ये भी कहना है कि पांच स्टूडेंट को सस्पेंड कर केवल खानापूर्ती की गई है, जबकि एक पूरा ग्रुप है जो आए दिन बाहरी राज्यों के छात्रों के साथ मारपीट करता है।
बाहरी राज्यों से आए छात्रों से बात की तो उन्होंने भी कहा कि ये घटनाएं आम हैं, लेकिन डर और प्रशासन के ढुलमुल रवैये के कारण किसी ने आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई। इस ताजा घटना ने छात्रों के गुस्से को भड़का दिया है। वहीं प्रबंधन का कहना है कि जो मौजूदा घटनाक्रम हुआ है उस पर एक्शन लिया गया है। पहले हुए घटनाओं की जानकारी नहीं है।
अर्थशास्त्र में एमए प्रथम वर्ष का स्टूडेंट हिरोस ज्योति दास उस रात को याद करते हुए आज भी सहम जाता है। हिरोस ने बताया कि मैंने विश्वविद्यालय से ही ग्रेजुएशन किया है। अभी गुरु गोविंद सिंह हॉस्टल में रहता हूं। 13-14 जनवरी की दरमियानी रात, मैं अपने कमरे में सो रहा था। सुबह करीब 4 बजे बिल्डिंग से आ रहे तेज शोर से मेरी नींद खुल गई।
मुझे बाथरूम जाना था, तो मैं कमरे से बाहर निकला। जब मैं वापस लौटा, तो मैंने देखा कि कुछ लड़के मेरे कमरे के अंदर मौजूद थे। हिरोस आगे बताते हैं, मैंने उनसे विनम्रता से बाहर जाने को कहा, तो उन्होंने मेरा नाम पूछा। नाम बताने के बाद उन्होंने पूछा कि मैं कहां से हूं। जैसे ही मेरे मुंह से ‘असम’ निकला, उनका व्यवहार बदल गया।
वे मुझे गंदी-गंदी गालियां देने लगे और चिल्लाकर बोले, ‘तू वहां से यहां क्यों आया है? अब आ गया है तो जिंदा वापस नहीं जाएगा।’ यह कहते हुए उन्होंने मुझ पर हमला कर दिया। वे मुझे तब तक मारते रहे जब तक आसपास के कमरों से दूसरे छात्र दौड़कर नहीं आ गए। किसी तरह उन्होंने मेरी जान बचाई। हमले के बाद हिरोस के मुंह से खून बह रहा था।
साथी छात्र उन्हें विश्वविद्यालय की डिस्पेंसरी ले गए, जहां से उन्हें अस्पताल रेफर कर दिया गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने बताया कि उनकी नाक की हड्डी टूट गई है और आंख के पास खून जम गया है।
छात्रों का प्रदर्शन और प्रशासन की कार्रवाई
इस बर्बर घटना के खिलाफ 14 जनवरी की सुबह से ही विश्वविद्यालय के छात्र लामबंद हो गए। उन्होंने प्रशासनिक भवन के सामने इकट्ठा होकर दोषियों के खिलाफ तत्काल और सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। छात्रों के बढ़ते दबाव के बाद, विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक आदेश जारी किया।
आदेश में लिखा है- मुख्य छात्रावास अधीक्षक एवं छात्रावास अधीक्षक के पत्र दिनांक 14 जनवरी में दी गई सूचना एवं अनुशंसा के आधार पर, हिरोस ज्योति दास के साथ छात्रावास में मारपीट करने वाले छात्रों, जिनमें अनुराग पाण्डेय, जतिन सिंह, रजनीश त्रिपाठी, विशाल यादव और उत्कर्ष सिंह शामिल हैं, को तत्काल प्रभाव से विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया है।
घटना की जांच एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु प्रकरण अनुशासन समिति को तथा कानूनी कार्यवाही हेतु स्थानीय पुलिस प्रशासन को अग्रेषित किया जाता है।” आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह कार्रवाई सीसीटीवी कैमरे की रिकॉर्डिंग के आधार पर की गई है। हालांकि, छात्रों का आरोप है कि यह कार्रवाई सिर्फ दिखावा है। 15 दिन का सस्पेंशन एक मामूली सजा है और दोषियों को बचाने की कोशिश।
क्षेत्रवाद, नस्लवाद और नशे का अड्डा बनता विश्वविद्यालय
यह घटना विश्वविद्यालय में पनप रही एक खतरनाक संस्कृति की ओर इशारा करती है। जम्मू-कश्मीर से आए और पिछले 4 सालों से यहां पीएचडी कर रहे छात्र रियाज चौधरी बताते हैं, “यहां पूरे देश से छात्र आते हैं। ज्यादातर लोग अच्छे हैं, लेकिन कुछ ऐसे समूह हैं जो क्षेत्र, जाति और धर्म के आधार पर छात्रों को परेशान करते हैं।
खासकर नॉर्थ-ईस्ट से आने वाले छात्रों को ‘चिंकी’ या ‘चीनी’ कहकर चिढ़ाना आम बात है। कई घटनाएं तो हॉस्टल की चारदीवारी में ही दबकर रह जाती हैं। प्रशासन को जितनी सख्ती दिखानी चाहिए, वह नहीं दिखाता, जिससे ऐसे लोगों के हौसले बुलंद हैं। राजस्थान से पढ़ने आए एक अन्य छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, विश्वविद्यालय में 20-30 लड़कों का एक ग्रुप है, जिसमें ज्यादातर मध्य प्रदेश के ही हैं। वे खुलेआम नशा करते हैं। अगर कोई बाहरी छात्र अकेला मिल जाए, तो उसके साथ मारपीट करते हैं।
आदिवासी सम्मान पर चोट और प्रशासन की नाकामी
विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष और आदिवासी छात्र संगठन के नेता रोहित मरावी इस घटना को आदिवासी क्षेत्र और समुदाय के सम्मान पर हमला मानते हैं। वे कहते हैं, यह एक आदिवासी विश्वविद्यालय है। यहां इस तरह की नस्लवाद और क्षेत्रवाद की घटनाएं हमारे सम्मान को ठेस पहुंचाती हैं। पिछले कई सालों से छात्रों पर ऐसे हमले हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है।
कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय के गेट पर पत्रकारों तक से मारपीट की गई थी। हमलावर नशे में धुत्त थे, जो हॉस्टल वार्डन और चीफ वार्डन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। घटना के बाद से ही हमारा संगठन पीड़ित छात्र के साथ था।
अधिकारी बोले- तत्काल एक्शन लिया, छात्र बोले- ये सब झूठ
इस मामले पर विश्वविद्यालय के पीआरओ रजनीश त्रिपाठी ने कहा, जैसे ही घटना की सूचना मिली, प्रशासन ने त्वरित एक्शन लेते हुए पांचों छात्रों को निष्कासित कर दिया। एक जांच दल भी बनाया गया है, जो अपनी रिपोर्ट देगा। सभी नियमानुसार कार्रवाइयां की जा रही हैं।
वहीं, अमरकंटक थाना प्रभारी लाल बहादुर तिवारी ने बताया, “पीड़ित छात्र की शिकायत पर पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। मामले की विवेचना की जा रही है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। इधर, छात्रों का आरोप है कि अगर उन्होंने आंदोलन नहीं किया होता, तो न तो विश्वविद्यालय कोई कार्रवाई करता और न ही पुलिस FIR लिखती।
घटना के कई घंटे बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी न होने पर भी छात्र सवाल उठा रहे हैं।




