संपादकीय
किसान तो यहां ठगा ही जा रहा है!

संजय सक्सेना
मध्यप्रदेश में यह साल किसान वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है और लगातार सरकार किसान हित की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकार की मंशा पर उसका ही सिस्टम पानी फेर रहा है। सरकारी खरीदी से लेकर बोनस और न जाने क्या-क्या ऐलान, लेकिन यहां किसान ठगा ही जा रहा है।
एक तरफ फसल कट चुकी थी और बारदाने की कमी का हवाला देकर गेहूं खरीदी की तारीखें बार-बार आगे बढ़ाई जाती रही। जैसे-तैसे खरीदी शुरू हुई तो ई-उपार्जन सॉफ्टवेयर में कैपिंग लागू कर दी गई। इसके तहत अधिकतम 2 हेक्टेयर यानि करीब 5 एकड़ तक जमीन वाले किसानों का ही गेहूं खरीदा जा रहा है। इससे अधिक जमीन वाले किसानों के स्लॉट बुक नहीं हो पा रहे हैं।
एक खरीदी केंद्र पर अधिकतम एक हजार क्विंटल गेहूं खरीदने की सीमा तय कर दी गई है, जबकि पिछले साल ऐसी कोई सीमा नहीं थी। साथ ही फसल के डबल वेरिफिकेशन की व्यवस्था लागू किए जाने से भी किसानों को फसल बेचने में भारी परेशानी हो रही है।
अब इन शर्तों के साथ भला सरकार की यह योजना कैसे सफल हो सकती है कि किसानों का एक-एक दाना खरीदा जाएगा? जमीनी हकीकत एकदम अलग नजर आ रही है। सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो, प्रदेश में करीब 19 लाख किसानों ने गेहूं बेचने के लिए पंजीयन कराया है। इनमें से लगभग 11 लाख किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर तक जमीन है, जबकि करीब 8 लाख किसानों के पास इससे अधिक भूमि है। अब इन आठ लाख किसानों से गेहूं खरीदी कैसे होगी? ये तो नियम के बाहर ही हो गए न।
इतना ही नहीं प्रति एकड़ गेहूं का उत्पादन 18 से 20 क्विंटल होता है, जबकि खरीद केंद्रों पर प्रत्येक किसान से सिर्फ 16 क्विंटल उत्पादन मानकर इससे अधिक गेहूं नहीं खरीदा जा रहा। यानि हर एकड़  पर दो से चार क्विंटल गेहंू नहीं बिक पाएगा। अब जिनके पास जमीन ज्यादा है, या जो गेहूं बच गया है, उसे बाजार में कम कीमत पर बेचना उसकी मजबूरी है।

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