Bhopal गैस त्रासदी के कचरे से पारे के रिसाव की चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट में जाने को कहा

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े संघ, हाइड्रोजनाइड के वसा कचरे के दहन के बाद बची राख से पारे (पारा) के रिसाव की आशंका संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले की निगरानी पिछले दो दशकों से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट कर रहा है, इसलिए वहां उपयुक्त सामग्री के साथ आवेदन दाखिल कर सकते हैं

फाइल भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति द्वारा स्थापित की गई थी। सब्जियों ने कहा कि यूनियन कार्बाइड के अवशेष के बाद अवशेषों में पारे की मात्रा शामिल होने से जंगल और आसपास के पर्यावरण के लिए खतरा पैदा हो गया है। रेजिडेंट्स ने रेजिडेंट्स के डॉ. पुरातनपंथी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलने वाले पदार्थों में पारे की मात्रा अधिक हो सकती है, जिससे भविष्य में मिट्टी और खनिजों में पारे की मात्रा अधिक हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने की याचिका में कहा गया है कि वैलिडिटी के खतरों से संबंधित सामग्री के साथ हाई कोर्ट में आवेदन करें। अदालत ने उम्मीद जताई कि इस मामले में इन्वेस्टिगेटरी हाई कोर्ट में शीघ्र प्रवेश और निष्कासन के लिए आवश्यक आदेश दिया जाएगा। यह याचिका मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 10 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती देने के लिए दी गई थी, जिसमें धार जिले के पीथमपुर स्थित आवास, स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी (टीएसडीएफ) को शामिल किया गया था।

इससे पहले अक्टूबर 2025 में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा था कि यह स्थान मानव आबादी लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा होती हैं। हालाँकि बाद में दिसंबर 2025 में कोर्ट ने अपना पूर्व आदेश जारी कर दिया, जो कि शराब के नशे में था। सुनवाई के दौरान टीवी चैनलों की ओर से पेश किए गए प्रमुख दिग्गज अवंत ग्रोवर ने अदालत को बताया कि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद टीवी चैनल को जला दिया गया था, लेकिन बचे हुए राख में पारे के खतरे का खतरा पैदा हो गया है।

ग्रोवर ने कहा कि साल 2015 में स्ट्राम्प्लेट्स मिर्ज़ा में लगभग 15 ट्रॉली पाई गई थी। जबकि 2025 की परीक्षण रिपोर्ट में दावा किया गया कि राख में पारा नहीं मिला। उन्होंने इस निष्कर्ष पर प्रश्न पूछे गए डॉ. असाध्य के अप्राकृतिक शोध का अध्ययन किया गया, जिसमें कहा गया है कि परीक्षण के दौरान पारे का सही माप नहीं दिया गया। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे पर विशेषज्ञ द्वारा जांच और विचार-विमर्श की आवश्यकता है, और यह प्रक्रिया उच्च न्यायालय की निगरानी में होनी चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यदि विशेषज्ञ रिपोर्ट में अपनाई गई कार्यप्रणाली में खामी बताई गई है, तो संबंधित समिति को उस पर प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया जाना चाहिए और यह पूरा विचार-विमर्श विश्वविद्यालय के अनुरूप होना चाहिए। ग्रोवर ने कोर्ट से यह भी कहा कि रेजोल्यूशन बॉक्स में राख राख को सेरेमनी पारे की जांच की जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि केस पहले उच्च न्यायालय की निगरानी में है। इसके बाद सजीवों ने कहा कि वे इस संबंध में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के लिए नए सिरे से आवेदन करेंगे। याचिका में यह भी कहा गया है कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2024 में जारी अधिसूचना में पीथमपुर सुविधा केंद्र से पीथमपुर सुविधा केंद्र से 60 किलोमीटर दूर तक फैले प्रदूषण के विनाशकारी तट को प्रभावित किया था, जो लगभग 50 मीटर दूर तक जल प्रदूषण को प्रभावित कर सकता है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि 2025 की परीक्षण रिपोर्ट में पारे की जांच सही तरीके से नहीं की गई है, आदा और दहन के दौरान इस्तेमाल किए गए नशे के कारण पारा अविशिष्ट राख में फंस सकता है, जिससे परीक्षण के निष्कर्ष गलत हो सकते हैं। केस को लेकर अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में आगे की राहत के लिए आवेदन करें।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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