Opinion

संपादकीय
विपक्षी गठबंधन का बिखराव

इसे सत्तापक्ष यानि एनडीए का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि विपक्षी दलों का मंच इंडिया पिछले साल मुश्किलों के बीच जिस तरह से बना और फिर जितनी तेजी से इसने उम्मीदें जगानी शुरू कीं, उतनी ही तेजी से उन उम्मीदों को ध्वस्त भी करता जा रहा है। और इसमें सभी पार्टियों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं ज्यादा आड़े आती दिख रही ह। यह नहीं सोचा जा रहा कि इससे हासिल क्या होगा? नीतिश कुमार का गठबंधन से पलायन भले ही उनकी आदत का परिचायक हो, लेकिन फिलहाल तो यह विपक्षी गठबंधन के लिए आखिरी कील साबित होता दिख रहा है।
विपक्षी गठबंधन की नींव जैसे भी पड़ी हो, लेकिन अनिश्चितता और असमंजस तभी से दिखने लगे जब 2023 के आखिर में हुए विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सीट बंटवारे की बातचीत एकतरफा ढंग से स्थगित कर दी गई। इसके पीछे यह दलील जरूर रही कि गठबंधन तो लोकसभा चुनावों के लिए प्रस्तावित था, सो विधानसभा चुनाव अपने दम पर लडऩे में कोई बुराई नहीं। लेकिन माना यही गया कि कांग्रेस नेतृत्व विधानसभा चुनावों के बेहतर नतीजों के आधार पर सीट बंटवारे की सौदेबाजी में अपना हाथ ऊपर रखना चाहता था। यह अलग बात है कि नतीजे उसकी उम्मीदों के अनुरूप नहीं आए। लेकिन इसके बावजूद ऐसा नहीं लगा कि कांग्रेस का रवैया बदला हो। हां कांग्रेस के रुख ने गठबंधन के कई घटक दलों को यह शिकायत करने का अपेक्षाकृत ठोस आधार दे दिया कि वो अलायंस को लेकर गंभीर नहीं है।
यह सही है कि सहयोगियों के गठबंधन छोडऩे की शुरुआत एनसीपी में पड़ी फूट के बाद से ही हो गई थी, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पलटना इस अर्थ में निर्णायक कहा जा सकता है कि वही गठबंधन के सूत्रधार की भूमिका निभा रहे थे। उन्हें अपनी ओर खींचकर भाजपा और ाएनडीए ने विपक्षी दलों के विशाल गठबंधन से बनते नैरेटिव को जबर्दस्त झटका दे दिया।
इस झटके से उबरने की कोशिशें ढंग से शुरू होतीं, उससे पहले ही पश्चिम यूपी के जाट बहुल इलाके में दखल रखने वाले रालोद नेता जयंत चौधरी ने भी पाला बदल लिया। निश्चित रूप से इन सबके पीछे एनडीए की तरफ से हो रहे सुनियोजित प्रयासों की भूमिका है। लेकिन इंडिया खेमा जिस तरह से बिखर रहा है, उसका पूरा श्रेय एनडीए की कोशिशों को नहीं दिया जा सकता। इसकी काफी जिम्मेदारी विपक्षी दलों के नेताओं को भी अपने सिर पर लेनी होगी।
हालांकि जिन दलों ने अभी तक इंडिया से नाता तोडऩे की घोषणा नहीं की है, परंतु उनमें भी किसी तरह का सामंजस्य नहीं दिख रहा। कभी तृणमूल नेता ममता बनर्जी कांग्रेस को अपने बूते 40 सीटें जीतने की चुनौती देती नजर आती हैं तो कभी आप नेता पंजाब और दिल्ली की सभी सीटें जीतने का दावा कर देते हैं। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इंडिया के अब भी बने रहने की बीच-बीच में होने वाली औपचारिक घोषणााओं को छोड़ दें तो ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे कि सचमुच जमीन पर इसे बनाए रखने की कोई कोशिश हो रही है।
ऐसे दौर में जब खुद विपक्ष लोकतंत्र को खतरे में बता रहा है और कहीं न कहीं जांच एजेंसियां भी खुलकर पक्षपात करती दिख रही हैं। केवल और केवल विपक्षी दलों के नेताओं को ही निशाना बनाया जा रहा है, ऐसे में विपक्षी गठबंधन को लेकर इन दलों का रवैया उन दलों के लिए तो नुकसानदायक है ही, लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं जान पड़ता। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष बहुत आवश्यक होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि सत्तापक्ष को हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाए। परंतु कहीं न कहीं सत्ता में आने के बाद जो बुराइयां सभी में आती हैं और जिस तरह से सत्तापक्ष एकतरफा निर्णय लेता चला जाता है, उसके लिए विरोध भी आवश्यक होता है। यह विरोध केवल प्रेस ब्रीफिंग या बयानों या सोशल मीडिया पर ट्वीट करने भर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जो कि आज विपक्ष कर रहा है। आम आदमी की आवाज लोकतंत्र में विपक्ष ही होता है, जो कि आज खत्म होती जा रही है। सत्तापक्ष कोई भी हो, वह केवल सत्ता में बने रहने और फिर से सत्ता में आने के लिए हर तरह के उद्यम करता है, इसके लिए किसी भी स्तर पर जा सकता है। तो ऐसे में विपक्ष की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अब विपक्ष यदि बिखरना ही चाहता है, तो इसमें क्या किया जाए? बस अगले चुनाव में फिर से असल मुद्दों की गठरी बांधे रखे रहो। कुछ नहीं होगा। सफलता उसी को मिलती है और मिलेगी, जो एकजुट होकर लड़ेगा।
– संजय सक्सेना

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