नई दिल्ली। साल 2025 खत्म होने वाला है और सोने-चांदी की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रहीं. एक साल के दौरान सोने ने 70 से 80 प्रतिशत का रिटर्न दिया है. वहीं, चांदी का रिटर्न बढ़कर 140 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है. दोनों कीमती धातुओं में चल रही तेजी के बाद कॉपर में भी जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है. तांबा भी कई साल के सबसे हाई लेवल पर पहुंच गया है. निवेशक, मैन्युफैक्चर और पॉलिसी मेकर्स की नजरें इस पर टिकी हैं. तांबे की कीमत में रैली किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई मजबूत फैक्टर्स के कारण आ रही है. इस तेजी में बढ़ती मांग, गिरती सप्लाई और ग्लोबल सपोर्टिव कंडीशंस शामिल हैं.
कॉपर की कीमत बढ़ने का कारण दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहा इलेक्ट्रिफिकेशन (बिजलीकरण) है. इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स, चार्जिंग स्टेशन और पावर ग्रिड अपग्रेड में पारंपरिक सिस्टम से कहीं ज्यादा कॉपर लगता है. देश क्लीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में तेजी से इनवेस्ट कर रहा है. यूटिलिटीज, ऑटोमेकर्स और इंफ्रा डेवलपर्स पहले से ही सप्लाई लॉक कर रहे हैं. इसका असर यह हो रहा है कि फिजिकल मार्केट में सप्लाई अब टाइट हो गई है.
मांग बढ़ने से कॉपर की सप्लाई में कमी आई
चीन दुनिया में सबसे बड़ा कॉपर कंज्यूमर है. यहां की मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी स्थिर हुई है. इंफ्रा या मैन्युफैक्चरिंग के लिए कोई भी सरकारी पॉलिसी सपोर्ट तुरंत कॉपर के रेट को बढ़ा देती हैं. दूसरी तरफ मांग बढ़ने से इसकी सप्लाई में कमी आई है. नई कॉपर माइंस बनाना काफी टाइम टेकिंग और कैपिटल वाला काम है. इसमें 10-15 साल का समय लगता है. बड़े प्रोड्यूसिंग इलाकों में ऑपरेशनल प्रॉब्लम, रेगुलेटरी बाधाएं और सालों के कम निवेश की वजह से प्रोडक्शन पर असर पड़ा है. जिन इलाकों में प्रोडक्शन बढ़ा है, वहां भी मांग के मुकाबले यह पूरा नहीं हो पा रहा.
सप्लाई ज्यादा, डिमांड कम से बढ़ रहा रेट
ग्लोबल एक्सचेंज और स्टोरेज में कॉपर के स्टॉक बहुत कम हैं. इन्वेंटरी कम होने से मांग बढ़ने या सप्लाई में किसी भी रुकावट पर कीमत में तेजी से उछाल आता है. सप्लाई और डिमांड का असंतुलन बाजार की स्थिति को टाइट कर रहा है. फिजिकल डिमांड और सप्लाई के अलावा भी इसमें लगातार इनवेस्ट करने वालों ने इसकी रैली को तेज किया है. कॉपर केवल इंडस्ट्रियल मेटल नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म की इकोनॉमिक ट्रांसफॉर्मेशन का स्ट्रैटेजिक मेटल माना जा रहा है. फंड्स और इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर कमोडिटी में एक्सपोजर बढ़ा रहे हैं.
डॉलर में ट्रेड होने वाली कमोडिटी आकर्षक हो गई
ग्लोबल ब्याज दर कम होने की उम्मीद से अमेरिकी डॉलर में गिरावट आई है. इससे डॉलर में ट्रेड होने वाली कमोडिटी आकर्षक हो गईं. जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और सप्लाई चेन की चिंता ने भी पहले से खरीदारी और स्टॉकपाइलिंग बढ़ाई है, जिससे कीमत में रिस्क प्रीमियम जुड़ गया है. कॉपर में आ रही तेजी काफी मजबूत है लेकिन मंदी, चीन से कमजोर मांग या सप्लाई में रिकवरी से इस पर दबाव देखा जा सकता है. तेज उछाल के बाद प्रॉफिट-बुकिंग से छोटी-मोटी गिरावट आ सकती है.इसके बावजूद लॉन्ग टर्म का ट्रेंड बुलिश रहेगा, क्योंकि इलेक्ट्रिफिकेशन और इंफ्रा की डिमांड सालों तक बनी रहेगी. कॉपर की कीमत में आ रही रैली से यह साफ है कि दुनिया की नई इकोनॉमी में यह मेटल काफी अहम है. EV, रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रिड अपग्रेड में कॉपर की डिमांड लगातार बढ़ रही है. यही कारण है कि कॉपर महज इंडस्ट्रियल मेटल नहीं, बल्कि ग्लोबल ग्रोथ का कॉर्नर स्टोन बन चुका है.
