मातृभाषा का महत्व

तरुण पिथौड़े आईएएस

हाल ही में मुझे IIT रूड़की में मातृभाषा पर एक व्याख्यान देने का अवसर मिला। मेरे लिए यह एक अनोखा अनुभव था क्योंकि इतने बड़े तकनीकी संस्थान से पढ़कर जहाँ छात्र देश और दुनिया के हर कोने में और बड़ी-बड़ी कंपनियों के बड़े-बड़े पदों पर आसीन होते हैं वहाँ भाषा के महत्व पर किसी कार्यक्रम का होना थोड़ा सा विचित्र सुख प्रदान कर रहा था।

संस्था में पहुँचकर अत्यंत गर्व का अनुभव हुआ – संस्था की सुंदर बिल्डिंगें, खेल के मैदान, ख़ूबसूरत रास्ते, चारों ओर पैदल या साइकिल पर चलते हुए छात्र-छात्राएँ, हर और चहल-पहल,और बहुत ही सुखद वातावरण – जैसे यह सब आने वालों का स्वागत कर रहा था। IIT रुड़की की भव्य बिल्डिंग देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया और इसी बीच मैं कार्यक्रम स्थल पर जा पहुँचा।

कार्यक्रम में मैंने अपने विचार व्यक्त किेए, अन्य वक्ताओं को सुना और इस अनुभव ने मेरा बहुत ज्ञानवर्धन किया। फिर जब मैं वापस घर की ओर लौट रहा था तब मैं भाषा के बारे में ही सोच रहा था और मेरे मन में कई विचार आ रहे थे।

मातृभाषा केवल एक भाषा नहीं होती बल्कि वह संप्रेषण का एक प्रभावी माध्यम होती है। वह हमारी संस्कृति, इतिहास, पहचान और संवेदनाओं तथा भावनाओ की वाहक होती है और इसलिए मातृभाषा सभी को इतनी प्यारी होती है। यह हमारे लिए एक विडम्बना है कि हम हमारी मातृभाषा में ना पढ़कर अंग्रेज़ी में पढ़ाई करते हैं। आज हमें इसके कुछ लाभ भी हैं परंतु इसके कारण हमारी मातृभाषाओं को वह अवसर नहीं मिल पाता जिसकी वे अधिकारी हैं। साथ ही समझने और सीखने में अधिक समय लगता है, और दूसरी भाषा में निपुणता प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक के लिए संभव नहीं है।

मातृभाषा ही वह माध्यम है जिससे बच्चों में आत्मविश्वास का सृजन होता है, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का संरक्षण होता है, विद्यार्थियों का भौतिक विकास होता है, और समाज में लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव होता है। इसलिए मातृभाषा की प्रासंगिकता हमेशा ही रहेगी और इसलिए मातृभाषा का प्रयोग और उसका विकास, हम सब की साझा ज़िम्मेदारी है।
फेसबुक वाल से साभार

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