संपादकीय
स्टेंट का खेल, संसदीय समिति भी हैरान…!

संजय सक्सेना
देश में स्वास्थ्य माफिया की मनमानी का दौर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में तो इंश्योरेंस पालिसी और आयुष्मान योजनाओं तक का बेजा फायदा उठाकर करोड़ों रुपए अवैध तरीके से कमाये जा रहे हैं। इसे कमाना तो नहीं कहा जा सकता, लूटे जा रहे हैं। हाल ही में संसदीय समिति भी इस लूट के जाल को देखकर हैरान हो गई है।
संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि दिल में डाले जाने वाले स्टेंट की कीमत 39 हजार औसतन होती है, लेकिन बिल कम से कम 2 लाख का वसूला जा रहा हे। असल में केंद्र सरकार ने स्टेंट जैसे मेडिकल उपकरणों की कीमतें तो तय कर दी हैं, लेकिन इसका असर मरीजों के इलाज के बिल पर नजर नहीं आ रहा। एक स्टेंट की कीमत पर 38,933 रुपए है, लेकिन इलाज का बिल 2 लाख रुपए से ज्यादा बन रहा है, क्योंकि प्रोसिजर, जांच रिपोर्ट और उपचार का खर्च लगातार बढ़ता हुआ बताया जा रहा है।
पहले तो रिपोर्ट की बात करते हैं। संसदीय समिति की यह रिपोर्ट करीब 10 साल से चली आ रही एक जनहित याचिका की गहन जांच पड़ताल के बाद तैयार हुई है। कमेटी ने जांच में पाया कि मेडिकल सिस्टम तो पारदर्शी हो गया है, लेकिन इसका फायदा मरीजों को नहीं मिल पा रहा है।
राज्यसभा में पेश याचिका समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि कार्डियक स्टेंट्स 85 प्रतिशत, घुटने के इम्प्लांट 70 प्रतिशत तक सस्ते हो चुके हैं। इस हिसाब से जनतो के 5900 करोड़ रुपए बच जाने चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मरीज का बिल बढ़ा ही है। इसकी वजह ये है कि बिल में बाकी रिपोर्ट के अनुसार मरीज को वॉल्व की 40 प्रतिशत और आर्टिक स्टेंट की 70 प्रतिशत लागत भरनी पड़ती है। याचिका समिति ने पाया है कि आयुष्मान योजना में कार्डियक कैथीटेराइजेशन का कवरेज 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है, जो मरीज पर भारी पड़ रहा है।
खुद कमेटी ने पाया कि प्रोसिजर, डॉक्टर की फीस, आईसीयू में रखने का खर्च और वास्तविक इलाज से पहले की गई जांचों का खर्च, आज भी बेलगाम है। कुल इलाज खर्च में इसका हिस्सा 70 प्रतिशत है। कमेटी ने सुझाव दिया है कि बिलिंग में प्रोसिजर शुल्क, डॉक्टर फीस, उपचार के पहले व बाद की जांचें भी शामिल की जाएं। हार्ट वॉल्व, पेसमेकर, न्यूरो सर्जिकल इंप्लांट्स के लिए भी नियम बनाये जाएं।
केंद्र सरकार लगातार दावा कर रही है कि उसने दिल के मरीजों की एंजियोप्लास्टी में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट के दाम काफी कम करा दिए हैं। हार्ट की धमनी (आर्टरी) के ब्लॉकेज खोलने के लिए लगाए जाने वाले जिस स्टेंट के दाम पहले 1 लाख रुपए तक वसूल किए जाते थे, अब उसकी अधिकतम कीमत 39 हजार रुपए तय कर दी गई है। इससे अस्पतालों में एंजियोप्लास्टी कराना सस्ता हो गया है। लेकिन, हकीकत इसके उलट है। स्टेंट के दाम कम होने के बाद भी एंजियोप्लास्टी सस्ती नहीं हुई है। बल्कि बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल और नर्सिंग होम में एंजियोग्राफी के रेट लाखों तक पहुंचते हैं।
पहले बात करते हैं स्टेंट की आवश्यकता की। कई बार तो डाक्टर दिल में दर्द होते ही स्टेंट की जरूरत बता देते हैं और सीधे एंजियोप्लास्टी कर दी जाती है। जबकि इसकी जरूरत नहीं होती। इससे निजी अस्पतालों को अधिक बिल वसूलने में सहूलियत होती है।
मरीजों से एडमिशन और इनवेस्टीगेशन चार्ज से लेकर प्रोसीजर और आईसीयू चार्ज तक निजी अस्पतालों में बेलगाम हो गया है। उनका लक्ष्य मरीज को स्वस्थ्य करने का नहीं, अपितु बिल वसूलने का हो गया है। वे जो भी शपथ लेते हैं, वो कचरे के डिब्बे में डाल दी जाती है। आजकल तो डाक्टर सीधे कहने लगते हैं कि उन्होंने लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई की है, तो जनसेवा के लिए थोड़े ही की है। वो तो उन्हें वसूलना ही है।
खैर, हमारे देश में तो लोग खुद ही लुुटने के लिए तैयार रहते हैं, इसीलिए स्वास्थ्य माफिया के हौसले भी बुलंद होते जा रहे हैं। और अब इसमें राजनीतिक और प्रशासनिक लोगों की हिस्सेदारी भी बढऩे लगी है, तो शिकायतों का भी कोई असर नहीं होता। बात स्टेंट की है, तो इसमें भारी लूट है। एक स्टेंट डलवाना कम से कम दो लाख रुपए का पड़ता है। इसमें एक खास बात यह है कि यदि आप डाक्टर से सीधे बात करो तो अलग कीमत बताई जाती है और जैसे ही आपने कहा कि इंश्योरेंस है, तो अचानक कीमत बढ़ जाती है।
एक आपरेशन की कीमत में इंश्योरेंस बताने पर पचास हजार से लेकर अस्सी हजार रुपए तक पैकेज में बढ़ा दिये जाते हैं। यह सब खुलकर होता है और ये संसदीय समिति को भी मालूम हो सकता है, लेकिन कहीं उल्लेख नहीं किया जाता। यानि कहीं न कहीं इसमें इंश्योरेंस और स्वास्थ्य क्षेत्र के बिचौलियों का कमीशन भी शामिल होता होगा। नहीं तो बिना बीमा और बीमे वाले आपरेशन में इतना अंतर क्यों?
ये मामला संसदीय समिति के संज्ञान में आ गया, उसकी रिपोर्ट तैयार हो गई, यही काफी है। इसकी कतई उम्मीद नहीं कि अस्पतालों या कहेें कि स्वास्थ्य माफिया की लूट में कोई कमी आएगी। वहां मरीजों को लूटने का सिलसिला जारी रहेगा। तभी अस्पतालों को कसाईखाना भी कहा जाने लगा है। गूंगों-बहरों की बस्ती है, मौत यहां सबसे सस्ती है..यह भी गलत साबित हो रहा है। अस्पताल की मौत भी बहुत महंगी हो गई है।

