संपादकीय
युद्ध का असर और आरबीआई की रिपोर्ट..

संजय सक्सेना
वैश्विक स्तर पर गहराते भू-राजनीतिक तनाव का असर भारत पर भी निश्चित तौर पर पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा में दिये बयानों में साफ कर दिया है कि कोविड जैसी परिस्थतियां बन सकती हैं। यानि मामला गंभीर होता जा रहा है। कहने को तो देश में सब कुछ सामान्य होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन हालात वाकई बिगड़ते नजर आ रहे हैं। केवल तेल और गैस तक ही मामला सीमित नहीं रहा, और भी कई क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
युद्ध का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। विदेशी मुद्रा और व्यापार घाटे के बढ़ते दबाव के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक यानि आरबीआई का दावा है कि अर्थव्यवस्था में बाहरी झटकों को सहन करने की मजबूत क्षमता है। रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिकूल वैश्विक परिस्थितियों के बाद भी देश में बेरोजगारी दर में मामूली कमी आई है। इसे सामान्य ही माना जा रहा है। 
रिजर्व बैंक का कहना है कि बीमा, बीपीओ, आईटीईएस और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में नौकरियों के नए अवसर पैदा हुए हैं। जॉबस्पीक इंडेक्स ने भी व्हाइट कॉलर जॉब्स में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्शाई है। एक राहतभरी खबर यह भी है कि मनरेगा के तहत काम की मांग में लगातार आठवें महीने कमी आई है। इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और वहां वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के तौर पर देखा जा रहा है।
लेकिन खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को रिजर्व बैंक ने भी न केवल माना है, अपितु यह भी कहा है कि महंगाई ने आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा दिया है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार देश में महंगाई के आंकड़े चिंताजनक हैं। फरवरी में मुद्रास्फीति बढक़र 3.2 प्रतिशत पहुंच गई, जो जनवरी में 2.7 फीसदी थी। यह उछाल मांस, मछली, खाद्य तेल, फल और सब्जियों की कीमतों में वृद्धि के कारण आया है। अरहर और मूंग दालों के दाम भी बढ़े हैं। हालांकि, चावल और गेहूं की कीमतों में स्थिरता या मामूली गिरावट रही। वैसे खुले बाजार की बात करें तो केवल मौसमी सब्जियों को छोड़ कर किसी की भी कीमतों में गिरावट नहीं देखी जा रही है।
अप्रैल, 2025 से जनवरी, 2026 के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि एफडीआई लगातार पांचवें महीने नकारात्मक रहा है। इस दौरान 75 प्रतिशत बाहरी निवेश अमेरिका, सिंगापुर, ब्रिटेन और यूएई की ओर चला गया। वस्तु व्यापार घाटे में वृद्धि से चालू खाता घाटा भी पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में 24.4 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई है। और ये आंकड़े रिजर्व बैंक ने ही जारी किये हैं।
रिजर्व बैंक ने आगाह किया है कि कच्चे तेल पर भारत की भारी निर्भरता को देखते हुए वर्तमान वैश्विक संकट पर करीबी निगरानी जरूरी है। भारत ने आयात स्रोतों में विविधता लाकर और घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाकर जोखिम कम करने की कोशिश की है। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण ईंधन आपूर्ति शृंखला में आए व्यवधान के प्रति सरकार को सक्रिय उपाय करने होंगे।
एक तरफ तो स्वयं प्रधानमंत्री मान रहे हैं कि हालात गंभीर हैं और आने वाले समय में कोविड जैसी स्थितियां भी बन सकती हैं। इस बयान के आने के बाद तमाम शहरों में लोगों ने पेट्रोल-डीजल के लिए कतार लगाना शुरू कर दिया। हालांकि जिला प्रशासन लगातार कह रहा है कि अभी हमारे पास ईंधन का पर्याप्त स्टाक है और हम अतिरिक्त व्यवस्थाओं में लगे हैं, लेकिन लोगों की सहन शक्ति जरा में ही जवाब देने लगती है।
यदि रिजर्व बैंक की रिपोर्ट की ही बात करें तो रोजगार के मुद्दे पर वह राहत बता रह है, लेकिन यथार्थ यह है कि लोग रोजमर्रा के खर्चों तक के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि रोजगार भले ही आंकड़ों में पर्याप्त है, लेकिन करोड़ों लोगों को दो वक्त का पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है।
हमारी रिपोर्ट आंकड़ों पर ही निर्भर रहती है। और सरकारी रिपोर्ट वाले आंकड़ों से यथार्थ हमेशा ही थोड़ा अलग रहता है। बाजार में महंगाई की बात खुद रिजर्व बैंक ने मानी है। देखा जाए तो युद्ध शुरू होते ही वस्तुओं के दाम बढऩे लगे थे। और जैसे ही गैस की किल्लत की खबर आई, चाय-नाश्ते से लेकर लगभग  सभी खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए गए। हालांकि गर्मी का मौसम होने के कारण जो सब्जियां अधिक टिक नहीं पाती हैं, उनके दाम कम हो गए हैं, लेकिन यह केवल तभी तक है, जब तक उनके खराब होने का डर है। बाकी के दाम ऊपर ही जा रहे हैं। हमारे देश में तो आपात स्थितियों का लाभ उठाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है और इसमें व्यापारी वर्ग तो जैसे लूटने के लिए तैयार बैठा होता है। कोरोना तक में देखा था कि कैसे व्यापारियों ने दो साल में करोड़ों का खेल कर लिया। इस पर किसी भी सरकार का नियंत्रण नहीं रहता। यही तो सरकार बनाते और चलाते हैं, ऐसा दावा किया जाता है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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