Editorial
स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी मिले

संजय सक्सेना
इंदौर की घटना ने हिला कर रख दिया है। लेकिन ये एकमात्र घटना नहीं है, जो प्रशासनिक लापरवाही और अनदेखी के कारण हुई, यह देश के अलग-अलग हिस्सों में घट चुकी समान त्रासदियों की श्रृंखला की एक कड़ी है। ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन कोई सबक नहीं लिया गया और न ही कहीं कोई ऐसा सिस्टम बनाया गया, जिससे इस तरह की घटना न घटे।
गुजरात के महिसागर जिले में हाल में बोरवेल और नगरपालिका जलस्रोतों के दूषित पानी से पीलिया का प्रकोप फैला था। तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में प्रदूषित नल जल पीने से लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ओडिशा के संबलपुर में 2014 के हेपेटाइटिस प्रकोप में लगभग चार हजार लोग संक्रमित हुए और लगभग 36 लोगों की मौत हुई थी। और भी कई घटनाएं हैं, जो दूषित पानी के कारण हुई हैं।
भारत में स्वच्छ पेयजल को लेकर बात तो की जाती है, लेकिन दूषित पेयजल को लेकर बार-बार घटनाएं सामने आ जाती है। एक संदर्भ की बात करें तो 2005 से 2022 के बीच भारत में तीव्र दस्त, टाइफाइड, वायरल हेपेटाइटिस और हैजा जैसी प्रमुख जलजनित बीमारियों के 20.98 करोड़ से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें 50 हजार से अधिक मौतें हुईं। नीति आयोग के कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के अनुसार हर साल लगभग दो लाख लोग सुरक्षित पेयजल की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण अपनी जान गंवाते हैं। यह ठेठ सरकारी आंकड़ा ही है।
इसके बावजूद जल गुणवत्ता को कभी भी उतनी राजनीतिक प्राथमिकता नहीं मिल पाई, जितनी अन्य पर्यावरणीय संकेतकों को मिल जाती है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है, जो चिंताजनक है। एक अनुमान के अनुसार देश के लगभग 70 प्रतिशत जलस्रोत दूषित हैं। दूषित पानी से होने वाली बीमारियां काम के दिनों की हानि, बढ़ते चिकित्सा खर्च और श्रम उत्पादकता में गिरावट का दुष्चक्र पैदा करती हैं। जल आपूर्ति एवं स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार, इससे 3.77 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं और हर साल करीब 7.3 करोड़ कार्यदिवसों का नुकसान होता है।
इन प्रकोपों की जड़ अक्सर जलस्रोत नहीं, बल्कि पानी स्रोत से नल तक पहुंचने वाले रास्ते होते हैं। कई शहरों में रिपोर्टें बताती हैं कि सीवर का पानी पेयजल पाइपलाइनों में मिल जाता है। यह शहरी शासन की एक जानी-पहचानी विफलता है। नगरीय निकाय अक्सर एक-दूसरे से कटकर काम करते हैं। सडक़ निर्माण एजेंसियां बिना जल और सीवरेज विभागों से समन्वय किए खुदाई कर देती हैं।
भूमिगत उपयोगिताओं के सटीक और साझा नक्शों के अभाव में भारी मशीनें पेयजल पाइपों को तोड़ देती हैं और सीवर लाइनों को क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। इससे सीवर का गंदा पानी जल पाइपों में चला जाता है और समस्या तब सामने आती है, जब तक जनहानि हो चुकी होती है। यह समन्वयहीनता शहरी अवसंरचना कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से और गहरी हो जाती है।
कई बार नई पाइपलाइनें बिछा दी जाती हैं, जबकि नीचे मौजूद पुरानी, रिसती और जर्जर पाइप नेटवर्क व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। सीवेज और पेयजल की लाइनें चिपका कर ही बिछा दी जाती हैं। भारत शहरीकरण को तो बढ़ावा दे रहा है, लेकिन इसमें सुरक्षा प्रोटोकाल, निरंतर निगरानी और संस्थागत जवाबदेही पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जल क्षेत्र की सबसे बड़ी कमी स्वतंत्र नियमन का अभाव है। बिजली क्षेत्र में राज्य विद्युत नियामक आयोग बनाए गए, ताकि सेवा प्रदाय और नियमन को अलग किया जा सके और मानकों का प्रवर्तन हो सके। शहरी जल आपूर्ति में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
नगरीय निकाय ही पानी देते हैं, वही जांच करते हैं और वही तय करते हैं कि सब ठीक है या नहीं? यानी संभावित प्रदूषक और नियामक अक्सर एक ही इकाई होते हैं। जब कोई स्वतंत्र नियामक नहीं होता तो न तो नियम सख्ती से लागू होते हैं और न ही गलती पर सजा मिल पाती है। पानी की जांच के नतीजे जनता से छिपे रहते हैं और प्रदूषण को तब माना जाता है, जब लोग बीमार पडऩे या मरने लगते हैं। ऐसे में जिम्मेदार लोग बच जाते हैं और लापरवाहियों का सिलसिला जारी रहता है।
सरकार भी हादसों के बाद ही जागती है। मरहम लगाने की कोशिश करती है, पर स्थाई उपाय नहीं करती। भारत ने खाद्य का अधिकार जैसे वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए हैं। सुरक्षित पेयजल संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की न्यायिक व्याख्या से निकला है, न कि स्पष्ट सेवा मानकों वाले किसी प्रवर्तनीय कानून से। इसलिए यह अधिकारों की श्रेणी से अलग हो जाता है।
हमें जरूरत है ऐसी व्यवस्था की, जो या तो समस्या पैदा होने ही न दे, या उससे पहले ही उसे रोक सके। जमीन के नीचे की पाइपलाइनों का सही नक्शा होना चाहिए, पानी की आपूर्ति करने वालों और उसकी जांच करने वालों को अलग रखा जाना चाहिए और अमृत 2.0 में नल से साफ और सुरक्षित पानी पहुंचाने पर विशेष जोर देना होगा।
इंदौर की मौतें कोई सामान्य चूक नहीं, हमारी लचर व्यवस्था का प्रमाण है। एक चेतावनी है, इसमें सुधार करने की। केवल घोषणाओं से काम चलने वाला नहीं है। साफ पेयजल प्रदाय सुनिश्चित करने के लिए देश भर में अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि दूषित पेयजल की समस्या से निजात मिल सके। साथ ही स्वच्छता अभियान में पेयजल स्रोत और पानी की टंकियों का निरीक्षण भी शामिल किया जाना चाहिए।



