Editorial
एसआईआर और बीएलओ…

संजय सक्सेना
कई राज्यों के साथ ही मध्य प्रदेश में भी विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआरका कार्य चल रहा है। इस काम की जिम्मेदारी विशेष रूप से बनाए गए बीएलओ के कंधों पर है। इनमें कई विभागों के कर्मचारी शामिल किए गए हैं। बीएलओ ही मतदाताओं को फॉर्म दे रहे हैं और फिर उनके डेटा का मिलानकर ऐप पर अपलोड कर रहे हैं। इस काम को तय समय में पूरा करना है, इसकी वजह से उन पर दबाव है। और काम के दबाव के चलते कुछ बीएलओ की मौत तक हो गई। 7 राज्यों में पिछले दो सप्ताह के दौरान 25 बीएलओ की मौत हुई है, जिनमें 9 मध्यप्रदेश के हैं।
काम रोका नहीं जा सकता, तो काम की अवधि बढ़ाई जा सकती है, क्योंकि एक तो अधिकांश बीएलओ प्रशिक्षित नहीं हैं। और थोड़ा-बहुत अनुभव है भी, तो तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें हैं, जिनके कारण उनका तनाव बढ़ जाता है।  पिछले दिनों शहडोल में एक बीएलओ की मौत हुई थी। परिवार का कहना था कि काम के दबाव में उनकी मौत हुई है। हालांकि प्रशासन के लोग इससे इनकार कर रहे हैं। प्रदेश के कई हिस्सों में बीएलओ के बीमार पडऩे की भी खबर आई है।
प्रशासन या सरकार भले ही इंकार करे, लेकिन बेवजह तो कोई जान नहीं देता। और हार्ट अटैक भी आ रहा है, तो इसके पीछे भी तनाव या काम का दबाव होना बड़ा कारण हो सकता है। एक महिला बीएलओ ने कहा कि एसआईआर में अचानक ड्यूटी लगा दी गई। हमें पर्याप्त ट्रेनिंग भी नहीं दी गई। अब कई बार नेटवर्क स्लो चलता है, एप में फोटो अपलोड करने में दिक्कत आ रही है। कई बार एप इतनी तेजी से अपडेट होता है कि जानकारी ही गायब हो जाती है। चूंकि नई प्रक्रिया है, इसलिए हड़बड़ी सी महसूस होती है।
वहीं, एक अन्य बीएलओ ने कहा कि कई मतदाता ऐसे हैं, जिनके एक जिले के अलावा अन्य जिले में भी नाम है, वे वर्तमान में जहां रह रहे हैं, वहां उस शहर में भी अलग-अलग वार्ड में नाम वोटर कार्ड बनवा लिया है। ऐसे में पहले किसी और जगह में बीएलओ उनका नाम मैप कर चुका है, लेकिन अब जब वे मतदाता हमारे सामने आते हैं और हम उसे मैप करते हैं तो पोर्टल उन्हें लेता ही नहीं। ऐसे में अन्य जगहों में नाम खोजने के कारण समय बहुत ज्यादा लग जाता है।
एक बीएलओ का कहना है कि शासन ने पर्याप्त समय दिया है, चूंकि शिक्षकों को 10 से 5 बजे तक कार्य करने की आदत है, वे डिजिटल भी कम हैं। ऐसे में अब बीएलओ के डिजिटल काम में हाथ पैर फूल रहे है। वहीं, एक ग्राम रोजगार सहायक को बीएलओ बनाया गया है। उन्होंने कहा कि बार-बार मीटिंग हो रही हैं, इसमें समय खराब हो रहा है। काम करते हैं तो कहीं से फोन आ जाता है। समय कम, काम ज्यादा है। इसलिए तनाव महसूस होता है।
बीएलओ बनीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का कहना है कि चूंकि पूरी प्रक्रिया 2003 के अनुसार हो रही है। पहले मतदाता दूसरे वार्ड में रहता था, अब दूसरे में है। मतदाता का पता बदल गया है, ऐसे में शहरों में ज्यादा दिक्कत हो रही है। गांव में काम करने में आसानी है।
धान कटाई के कारण मजदूर खेतों पर काम करने चले जाते हैं। मजदूर बहुत सुबह या शाम 7 के बाद मिलते हैं। कई लोग बाहर गये हुये हैं। ठंड में सुबह जल्दी उठकर रात में देर रात काम करना पड़ता है। वहीं, कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की भी समस्या है। इसकी वजह से डेटा अपलोड नहीं होता है।
कुल मिलाकर एसआईआर आवश्यक है, यह होना चाहिए, यह एक बात है। लेकिन कोई भी काम जानलेवा नहीं बनना चाहिए। वैसे, एसआईआर की प्रक्रिया पर विपक्ष भी लगातार सवाल उठाता आ रहा है और भले ही बीएलओ खुलकर नहीं बोल पा रहे हों, पर गड़बड़ी की गुंजाइश तो इसमें बनी हुई है। और कहीं न कहीं इसका अनुचित दबाव भी उन पर डाला जा रहा है।

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