Editorial
आरक्षण और क्रीमी लेयर

देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन भी आरक्षण से जुड़े उस महत्वपूर्ण मामले को उठाया, जिस पर वह अक्सर बोलते रहे हैं। न्यायमूर्ति ने ओबीसी की तरह अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति में भी क्रीमीलेयर लागू करने की वकालत की। देखा जाए तो मुख्य न्यायाधीश ने इस मुद्दे से जुड़े जिन पहलुओं को उठाया, वे अपनी जगह बिल्कुल सही और व्यावहारिक भी हैं, उन पर गौर किया जाना चाहिए।
जो प्रधान न्यायाधीश ने कहा है, आरक्षण का असल उद्देश्य भी यही है। यानि  कि आरक्षण उसी को मिलना चाहिए, जो जरूरतमंद है। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे बढऩे के लिए समान अवसर प्रदान करना। लेकिन पिछड़े वर्गों के भीतर भी जो आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें हमेशा के लिए यह लाभ नहीं मिलना चाहिए।
क्रीमीलेयर का मुद्दा नया नहीं है। 1969 में तमिलनाडु सरकार ने पिछड़े वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए सत्तनाथन कमिशन का गठन किया था। इसी कमिशन ने पहली बार क्रीमीलेयर का कॉन्सेप्ट पेश किया था। 1986 में कर्नाटक सरकार से जुड़े एक मुकदमे में शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार को आर्थिक आधार पर जांच लागू करनी चाहिए, जिससे कि सही लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके।
इस मामले में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ का मुकदमा भी एक नजीर बन गया है। इसी में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत और ओबीसी यानि पिछड़े वर्ग में क्रीमीलेयर लागू करने का फैसला दिया था। इसके बाद केंद्र ने एक आयोग का गठन किया, ताकि क्रीमीलेयर को परिभाषित किया जा सके।  इसीलिए कहा जा रहा है कि जब एक वर्ग में क्राइटेरिया तय किया जा चुका है, तो इसे दूसरे वर्गों में भी लागू करने में दिक्कत नहीं आनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल अगस्त में एससी-एसटी कैटिगरी के भीतर उप श्रेणी को मंजूरी दी थी। इसका मकसद यही था कि वर्ग के भीतर मौजूद हर जाति तक आरक्षण का फायदा पहुंचे और कोई खास तबका ही लाभान्वित न होता रहे। क्रीमीलेयर भी इसी उद्देश्य के लिए आवश्यक है। 50 साल पहले जस्टिस कृष्ण अय्यर ने आरक्षण की इसी गड़बड़ी की तरफ ओर ध्यान दिलाया था कि ऊपरी तबका सारे लाभ ले जाता है।
देश में इस समय आरक्षण की सीमा को लेकर चर्चा चल रही है। एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी चल रहा है कि 50 प्रतिशत की सीमा नहीं होनी चाहिए। पदोन्नति में आरक्षण को लेकर भी सालों से मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के मामले अदालत में चल रहे हैं। लेकिन, यदि जरूरतमंदों को इसके बाद भी लाभ नहीं मिल पा रहा, तो कोई भी लिमिट आरक्षण के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती। एक साधारण जो आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें दूसरों का रास्ता रोकने के बजाय, आगे से हटकर पीछे वालों को रास्ता देना चाहिए।
बात भी सही है। दूसरे वर्गों का अधिकार छीनने के बजाय जिस वर्ग के लोग आरक्षण लेकर आगे निकल गये हैं, उन्हें अपने वर्ग को अवसर देने के लिए आगे आना चाहिए। इसी कारण तो आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कही जाती रही है। कहीं न कहीं आरक्षण के लिए आर्थिक आधार भी शामिल किया जाना चाहिए।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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