Editorial
आन लाइन गेम और मौतें

संजय सक्सेना

गाजियाबाद में तीन सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। मंगलवार रात 2 बजे तीनों बहनें बालकनी से कूद गईं। तीनों ने आत्महत्या से पहले कमरे को अंदर से बंद किया, फिर स्टूल रखकर एक-एक करके बालकनी से छलांग लगा दी।
तीनों बहनों की उम्र 12 से 16 साल के बीच है। तीनों को टास्क-बेस्ड कोरियन लव गेम की लत थी। पिता के मुताबिक, तीनों हर वक्त एक साथ रहती थीं। एक साथ नहाती थीं और टॉयलेट जाती थीं। इस कदर गेम की लत थी कि स्कूल भी छोड़ दिया था। पिता ने उन्हें गेम खेलने से मना किया और फटकार लगाई। इसके चलते तीनों बहनों ने यह कदम उठाया। तीनों बहनें जिस कमरे में सोती थीं, वहां डायरी के 18 पेज का सुसाइड नोट लिखा मिला। इसमें कहा गया- मम्मी-पापा सॉरीज् गेम नहीं छोड़ पा रही हूं। अब आपको एहसास होगा कि हमसे कितना प्यार करते थे, जिस गेम को आप छुड़वाना चाहते थे।
कोरियन लव गेम एक ऑनलाइन गेम है। यह इंटरनेट पर चलने वाले ऐसे ऑनलाइन चैट सिस्टम का नाम है, जिसमें सामने वाला खुद को कोरियन या विदेशी लडक़ा-लडक़ी बताकर बात शुरू करता है। यह गेम सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स के जरिए फैलता है। शुरुआत में सामने वाला दोस्ती और प्यार की बातें करता है। आसान-आसान टास्क दिए जाते हैं, ताकि भरोसा बन जाए। धीरे-धीरे टास्क बढ़ते जाते हैं। मानसिक दबाव बनने लगता है। कई मामलों में बात न मानने पर डराया जाता है। इससे खेलने वाला व्यक्ति तनाव में आ जाता है और उसका व्यवहार बदलने लगता है।
आन लाइन गेम की आदत ने केवल इन तीन बच्चियों को ही मौत नहीं दी, हर दूसरे-तीसरे दिन इससे एक न एक मौत हो रही है। हाल ही में राजधानी भोपाल के पिपलानी इलाके की श्रीराम कॉलोनी में रहने वाले 14 वर्षीय अंश साहू ने सोमवार दोपहर अपने घर में फांसी लगा ली। आशंका है कि ऑनलाइन गेम में दिए गए टास्क को पूरा करने के लिए बच्चे ने आत्मघाती कदम उठाया। 8वीं क्लास में पढऩे वाला अंश अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। माता-पिता प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं। इस तरह की घटनाएं रोज हो रही हैं। इसके पहले ब्लू व्हेल गेम के चक्कर में देशभर से कई बच्चे जान गंवा चुके हैं। ब्लू व्हेल चैलेंज गेम को सुसाइड गेम भी कहा जाता है। यह एक ऑनलाइन गेम है, जिसमें पार्टिसिपेंट को एक चैलेंज दिया जाता है। इस गेम में 50 स्टेप्स हैं, जो धीरे-धीरे कठिन होते जाते हैं। इस गेम में एक एडमिनिस्ट्रेटर और पार्टिसिपेंट शामिल होता है। एडमिनिस्ट्रेटर 50 दिन की अवधि के दौरान रोजाना एक टास्क सौंपता है। शुरुआत में ये टास्क सिंपल होते हैं, लेकिन आखिरी स्टेप्स में खुद को नुकसान पहुंचाने के साथ कठिन होते जाते हैं और कई पार्टिसिपेंट के सुसाइड पर जाकर खत्म होते हैं। इस गेम को भारत सरकार ने 2017 में बैन कर दिया।
लेकिन अनेक गेम ऐसे हैं, जिनती लत पड़ जाती है तो बच्चे जिद्दी और चिड़चिड़े हो जाते हैं। उन्हें पढ़ाई-लिखाई तो छोड़ो, परिवार के लोगों या अन्य किसी से भी मिलना-जुलना अच्छा नहीं लगता। बस मोबाइल चाहिए रहता है। पहले कुछ देर, फिर कुछ घंटे और फिर लगातार गेम चलता रहता है। असल में कई बार तो यह लत मां-बाप के कारण ही लगती है। जब बच्चे कुुछ समझने वाली स्थिति में नहीं होते, उन्हें मोबाइल पकड़ा कर व्यस्त रखने की कोशिश की जाती है। कई बार यह मजबूरी भी होती है।
बच्चों के साथ ही बड़ों में भी अब मोबाइल और खासकर आनलाइन गेम खेलने की लत पड़ती जा रही है। लोग मोबाइल पर जुआ-सट्टा भी खेलने लगे हैं और जब ज्यादा हार जाते हैं, तो आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। बच्चों की स्थिति यह है कि गेम खेलने से मना करने पर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
असल में यह हमारी बदलती पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के चलते ही हो रहा है। हमारे परिवार सिमटते जा रहे हैं और समाज भी एकाकी से होते जा रहे हैं। आपस में संवाद कम हो रहा है। पहले बच्चे इकट्ठे होकर खेलते थे, पढ़ते थे। अंताक्षरी और पहेली बूझने जैसे खेल बच्चों की जानकारियां बढ़ाते थे, उनकी क्षमताओं और योग्यता में वृद्धि करते थे। अब मोबाइल सब कुछ खत्म करता जा रहा है। इसके लिए सामाजिक चेतना की आवयश्कता है।
हमारे सामाजिक संगठन जिस तरह से धार्मिक, सांप्रदायिक और जातिगत मुद्दों पर उलझे हुए हैं, वो नशा मोबाइल से भी खतरनाक है। इसके बजाय हम यदि नई पीढ़ी को मोबाइल की लत से दूर रखें, आन लाइन गेमिंग से दूर रखने में सफल हो जाएं, तो हम बेहतर पीढ़ी तैयार कर सकते हैं। काश! ऐसा हो पाए। हमारे समाज के ठेकेदार जागेंगे, सुधरेंगे, मानसिक गुलामी छोड़ेंगे, तभी हम अपने बच्चों को बचा पाएंगे। समस्या विकराल है और हम सोये हुए हैं।

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