Editorial
गण का कैसा तंत्र….?

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद 1929 में पूर्ण स्वराज की मांग औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य बन गई और भारतीयों ने 26 जनवरी, 1930 को समूचे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया। इसके माध्यम से ब्रिटिश शासन के अधीन उपनिवेश के दर्जे को नकारते हुए पूर्ण स्वराज के लक्ष्य के लिए खुद को समर्पित किया। यह स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ था जिसके माध्यम से देशवासियों ने औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत सांवैधानिक सुधारों की मांगों से आगे बढ़ते हुए एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य सामने रखा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तो भारत औपचारिक रूप से एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया, जिसने स्वतंत्र भारत में संवैधानिक शासन की शुरुआत की। 1976 में 42वें संशोधन अधिनियम के ज़रिए, ‘समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े गए। इसके बाद भारत संप्रभु, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। नए बनाए गए संविधान को भारत सरकार अधिनियम 1935 के स्थान पर लागू किया गया। इसके साथ ही, संविधान के तहत काम करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिकार और संप्रभुता सौंप दी गई। 26 जनवरी की तारीख जानबूझकर चुनी गई थी, क्योंकि यह तारीख 1930 के पूर्ण स्वराज के ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए थी, इस दिन पूर्ण स्वतंत्रता को राष्टीय लक्ष्य घोषित किया गया था। इस तारीख को संविधान लागू करके, स्वतंत्र भारत ने प्रतीकात्मक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन के राजनीतिक संघर्ष को संवैधानिक गणराज्य के संस्थागत ढांचे से जोड़ा।
यह इतिहास का वो पन्ना है, जो सबको मालूम है, फिर भी हम दोहराते हैं। इसलिए, ताकि हमें अपनी आजादी और उसके साथ ही गणतंत्र की कीमत तो पता रहे। गणतंत्र दिवस एक राष्ट्रीय उत्सव होने के साथ-साथ हमें यह बताता है कि कैसे देश की आजादी के लिए हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया था। उनके साहस, समर्पण और बलिदान ने आज के आधुनिक भारत की नींव रखी थी, जिसे आज हम गर्व से अपना भारत कहते हैं।
हम स्वतंत्र हैं। गणतंत्र हमारी आत्मा है। परंतु क्या यह सच नहीं है कि हमारी इस आत्मा पर बोझ सा है। क्या हमारे गणतंत्र को ग्रहण लग गया है? गणतंत्र दिवस मनाते हुए मन में खयाल तो आता ही है। आता इसलिए है, क्योंकि हमारे चारों ओर ऐसा वातावरण बन गया है, जिसमें घुटन सी हो रही है। जिस आजाद श्वास के लिए हमारे पुरखों ने बलिदान दिया, सर्वस्व न्यौछावर किया, हम उसमें घुटन का अनुभव कर रहे हैं।
यह बात और है कि कई लोगों का इसका आभास नहीं हो रहा है। और कई लोगों को आभास हो भी रहा है, तो वे इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। यह घुटन है, परिवारों के साथ ही समाज के टूटने की। घुटन है, समाज में घुलते हुए जहर की। घुटन है, उस पीढ़ी को बर्बाद होते हुए देखने की, जो हमारा वर्तमान और भविष्य है। घुटन है रिश्तों में बढ़ रही दूरियों की, टूटते धागों की। घुटन है, चरित्रों में आ रही गिरावट की। आपसी मनमुटाव बढऩे की। कट्टरता से बढ़ती हिंसाओं की..।
हमारी भाषा बिगड़ रही है। संवाद में कड़वाहट बढ़ रही है। जिस संविधान को पूजते हैं, उसका मखौल उड़ाया जा रहा है। जो जिम्मेदार हैं, वही दोहरा चरित्र रखे हुए हैं। अब तो दिखावे के लिए भी आपसी सद्भाव का टोटा होता दिख रहा है। हम केवल अपने पर्यावरण अपनी जलवायु को ही प्रदूषित करने में नहीं लगे हैं, अपने सामाजिक वातावरण को भी बिगाड़ रहे हैं। बात काफी आगे जा चुकी है। सांप्रदायिक रंग चोखा हो गया है और अब जातिवाद की लकीरें भी गहराती जा रही हैं। क्या होगा, कुछ अनुमान नहीं लगाया जा सकता। परंतु यह तय है कि परिणाम भी अच्छे नहीं आएंगे।
हम जिस नई पीढ़ी को गलत बताते हैं, वह तो पुरानी पीढ़ी का अनुसरण ही तो करती है। हम उसे दे क्या रहे हैं? जैसा बोएंगे, वैसा ही तो काटेंगे। हम उसे इसी घुटन भरे वातावरण में तो रहने को विवश कर रहे हैं। उसे खुला आसमान चाहिए। फिर भी, कुछ उम्मीदों की किरण तो बाकी रहती ही हैं। भले ही उन्हें कैद करने की कोशिशें की जाएं, वो जगह बनाकर बाहर निकल ही आती हैं। जैसे गुलामी से आजादी का रास्ता निकला, वैसे ही इस घुटन से बाहर निकलने की उम्मीद कर सकते हैं।
और, जिस नई पीढ़ी को नकारते हैं, वही हमारा मार्गदर्शन करेगी। यही उलटवासी तो चलती आई है। हमें गणतंत्र के सही मायने समझने ही होंगे। हमें इस समाज को विघटन से बचाना होगा। देश तो तभी बचेगा, जब समाज बचेगा। परिवार एकजुट होगा, तब समाज की बात सोचेंगे। संविधान कानून की किताब नहीं होती। कुछ नियम-कायदों के साथ समृद्ध परंपराओं की विरासत भी साथ होती है। संस्कृति आपसी विद्वेष से नहीं, समरसता से अक्षुण्ण रहती है। और समरसता केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
आज गणतंत्र दिवस पर संकल्प लें। इस माहौल को बदलने का प्रयास करेंगे। करते रहेंगे। देशभक्ति से सराबोर जो माहौल एक दिन रहता है, प्रयास करें, इसका विस्तार हो। केवल दिखाने-सुनाने वाला गणतंत्र नहीं, अनुभव करने वाला गणतंत्र चाहिए। आशाओं का आसमान है, लहराता तिरंगा है, वंदे मातरम का उद्घोष है। जय हिंद। जय भारत। जय गणतंत्र।
