संपादकीय
आग की घटनाएं और भटकता फायर एक्ट

संजय सक्सेना
क्या वास्तव में अफसरशाही इस कदर हावी है कि मध्यप्रदेश में पिछले 7 साल से फायर एक्ट लागू नहीं हो पा रहा है, जबकि केंद्र सरकार 2019 में ही एक्ट का एक मॉडल ड्राफ्ट बनाकर सभी राज्यों को भेज चुकी है और 26 राज्य इसे लागू भी कर चुके हैं। लेकिन इस राज्य में एक्ट की फाइल बस इधर से उधर घूम ही रही है।
असल में, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों में एकरूपता लाने के लिए फायर एक्ट का एक मॉडल ड्राफ्ट भेजा था। 16 सितंबर 2019 को केंद्र सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी ने इस संबंध में एक पत्र भेजा, जिसे नगरीय विकास एवं आवास विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव ने नगरीय प्रशासन संचालनालय को भेज दिया। इसके बाद संचालनालय ने केंद्र के मॉडल ड्राफ्ट के आधार पर प्रस्तावित फायर एक्ट का प्रस्ताव पेश किया। प्रेजेंटेशन के बाद इसमें संशोधन के निर्देश दिए गए।
10 फरवरी 2020 को संशोधित प्रस्ताव नगरीय प्रशासन विभाग के अपर आयुक्त को भेजा गया। 24 फरवरी 2020 को तत्कालीन आयुक्त पी नरहरी ने इसे अनुमोदन के लिए तत्कालीन प्रमुख सचिव संजय दुबे को भेजा। इसके बाद नगरीय विकास एवं आवास विभाग के तत्कालीन मंत्री जयवर्धन सिंह की मंजूरी के बाद फायर एक्ट को विधि विभाग भेजा गया। तत्कालीन पीएस ने यह कहते हुए प्रस्ताव विधि विभाग से वापस ले लिया कि मप्र भू-विकास नियम 2012 में पहले से ही फायर एक्ट से संबंधित प्रावधान हैं।
8 नवंबर 2021 को भोपाल के हमीदिया अस्पताल में आग लगने से 8 मासूमों की मौत हो गई थी, जिसके बाद फिर नगरीय प्रशासन विभाग की नींद खुली  ओर विभाग ने सभी नगर निगमों को फायर सेफ्टी ऑडिट के निर्देश दिए। इसी तरह सतपुड़ा भवन में भी भीषण आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए सेना की मदद लेना पड़ी थी, तो तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह ने मामले की समीक्षा की और प्रस्तावित फायर एक्ट को लागू करने के निर्देश दिए। मुख्य सचिव के निर्देश पर, नगरीय प्रशासन विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव मनीष सिंह ने फाइल उस समय मंत्री रहे भूपेंद्र सिंह को भेजी। प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद इसे एकबार फिर विधि विभाग को भेजा गया।
17 अप्रैल 2023 को विधि विभाग ने फायर एक्ट को मोडिफाइड कर प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके बाद इस पर कोई आगे की कार्रवाई नहीं हुई और इसे मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली वरिष्ठ सचिवों की समिति के सामने प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बजाय, इसमें फिर से संशोधन की प्रक्रिया शुरू हो गई और यह लंबित हो गया। हाल ही में नगरीय प्रशासन विभाग के एसीएस ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली वरिष्ठ सचिवों की कमेटी के सामने फायर एक्ट 2025 का एक नया संशोधित ड्राफ्ट प्रस्तुत किया। जबकि इस कमेटी को यह नहीं बताया गया कि फायर एक्ट 2023 को विधि विभाग पहले ही मंजूरी दे चुका है।
नगरीय प्रशासन विभाग के दो दो पूर्व मंत्री इसे हरी झंडी दे चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में सुझाव आया कि एक अलग फायर एक्ट की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह काम नगरीय निकायों का है। हालांकि, इस बैठक में यह तय हुआ है कि केंद्र के मॉडल ड्राफ्ट के प्रावधानों में संशोधन कर इसे एक बार फिर प्रस्तुत किया जाए। फिलहाल वित्त विभाग इस ड्राफ्ट का परीक्षण कर रहा है।
मप्र में फायर एक्ट कब लागू होगा इसे लेकर विधानसभा में बहस भी हो चुकी है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जवाब देते हुए नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि राज्य सरकार मप्र नगर पालिका अधिनियम 1956 और 1961 के तहत जरूरी कदम उठाती है। साल 2022 से ई नगर पालिका पोर्टल के जरिए फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट ऑनलाइन दिए जाते हैं।
बताया यह जाता है कि फायर सेफ्टी एक्ट से केवल अफसरशाही ही नहीं, बड़े-बड़े बिल्डर और अस्पतालों तक को दिक्कत है। उन्हें कई तरह की तैयारियां करनी पड़ेंगी। एक्ट में सख्त प्रावधान हैं, सो उन्हें खर्च भी करना पड़ेगा और तैयारी नहीं होने पर जुर्माना भी भरना होगा। केवल इसके चलते ही आम आदमी को आग से खेलने के लिए विवश किया जा रहा है। ऊंचे भवन और अस्पताल या ऐसे ही संस्थान वाले केवल पैसा कमाने का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं, उन्हें किसी की जान की परवाह नहीं।
तभी तो जब भी बड़ी आग लगती है, लोगों की जानें चली जाती हैं, तब फायर सेफ्टी एक्ट की बात होती है। फाइल चलती है। और फिर कुछ दिन बाद वो फाइल किसी न किसी बहाने से दबा दी जाती है। विधानसभा में मामला उठा, क्या हुआ, फिर फाइल चली, और वित्त विभाग में आराम फरमा रही है। सवाल तो उठेंगे ही, आग की घटनाओं को कब तक नजरअंदाज किया जाएगा? कब तक संशोधन और अन्य बहाने बनाकर एक्ट की फाइल घूमती रहेगी? क्या केंद्र सरकार के निर्देश और विधानसभा में उठे मुद्दों की कोई अहमियत नहीं है? क्या ऐक्ट लागू होने के बाद संशोधन नहीं हो सकता? आखिर क्यों इतनी लापरवाही की जा रही है? और, क्या ये लापरवाही ही है या कोई साजिश?

Exit mobile version