Editorial
दवाओं पर असर…!

संजय सक्सेना
सोना-चांदी की बढ़ती कीमतों का असर सेहत पर भी पडऩे लगा है। आयुर्वेदिक दवाएं वैसे भी महंगी होती जा रही हैं, अब सोने-चांदी ने उनमें और आग लगाने का काम किया है। खास तौर पर कमजोरी दूर करने, डायबिटीज और जुकाम-एलर्जी से जुड़ी बीमारियों की दवाओं के दाम आसमान पर पहुंचने लगे हैं। शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवा स्वर्ण भस्म की कीमत एक साल में 19 से बढक़र 26 हजार पहुंच गई है। डायबिटीज की दवा वसंत कुसमाकर 1100 रुपए महंगी हुई है। महंगाई की मार से डायबिटीज की दवा और सर्दियों की संजीवनी के साथ ही सबसे लोकप्रिय शक्तिबद्र्धक च्यवनप्राश भी अछूते नहीं हैं।
आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार चांदी में बैक्टीरिया से लडऩे की क्षमता होती है। ऐसे में इसका उपयोग गंभीर इन्फेक्शन, जलने के घाव वाली क्रीम में किया जाता है। इसके अलावा कुछ मेडिकल उपकरणों में भी यूज होता है। सोने और चांदी का आयुर्वेदिक और भस्म आधारित दवाओं में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि सोने-चांदी के दामों में बेतहाशा वृद्धि के कारण आयुर्वेदिक दवाओं की कीमतों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पिछले एक साल में 10 से लेकर 40 प्रतिशत तक आयुर्वेदिक दवाओं के दाम बढ़े हैं। और हालिया एक महीने में इनमें और अधिक तेजी से वृद्धि हुई है।
आयुर्वेद में सोने और चांदी को नोबल मैटल कहा जाता है। अलग-अलग दवाओं में इनका इस्तेमाल बहुतायत में होता है। सामान्यत: सोने से निर्मित दवाओं को इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में लिया जाता है। वहीं चांदी से निर्मित दवाओं को ब्रेन के फंक्शन को इम्प्रूव करने के लिए किया जाता है। 50 से अधिक आयुर्वेदिक दवाइयों में सोने-चांदी का इस्तेमाल होता है। इसमें सर्दी-जुकाम, डायबिटीज, कमजोरी दूर करने, सांस रोग, यूरीनरी इन्फेक्शन आदि की दवाइयां शामिल हैं। इसके अलावा च्यवनप्राश में भी इसका उपयोग होता है। देशभर में आयुर्वेदिक दवाओं का सालाना व्यापार हजारों करोड़ तक पहुंच चुका है।
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में रसशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ.अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं- सोने-चांदी की कीमतें बढऩे का डायरेक्ट और इनडायरेक्ट असर पड़ रहा है। सीधा असर ये है कि कीमतें बढऩे से दवाइयां महंगी हो गई हैं। इनडायरेक्ट असर ये है कि महंगी होने से डॉक्टर्स ये दवाइयां लिखने से बचेंगे। लिखेंगे तो मरीज महंगी होने के कारण खरीद नहीं पाएगा। इसके अलावा दवाओं का निर्माण करने वाली कंपनियां भी उस गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल करने से बचेंगी।
दांतों की कैविटी भरने और क्राउन लगाने में चांदी और सोने की मिश्रित धातुओं का उपयोग किया जाता है। दांतों में चांदी की फिलिंग के लिए काम आने वाला सिल्वर अलॉय पाउडर के 60 ग्राम पैकेट की कीमत पांच हजार रुपए से ज्यादा हो गई है। सामान्य तौर पर प्राइवेट क्षेत्र में एक दांत की फिलिंग में 800 से 5 हजार रुपए लगते हैं।
सोने से बनने वाली कुछ खास दवाओं में वसंतकुसमाकर, कल्याण सुन्दर रस, मकरध्वज रासायन, कुमार कल्याण रस, हेमरभा पोटली, क्षय केसरी रस, वसंत मालती रस, स्वर्ण प्रप्ति, कुमुदश्वर रस, कंचनाभरा रस, चतुर्भुज रस, बृहत्वताचिंतामणि रस, कांडारप रस, त्रिलोकयाचिंतामणि रस, नवरतनराज मृगांक रस, मकध्वज रस, महामृगांक रस, सर्वेशवारा रस, मेहकेसरी रस, रासराजा रस, शवसा कसा चिंतामणि रस, हेमरभा पोटली रस, चतुरमुख रस, योगेंद्र रस, पुत्पक्वाविशमा ज्वारंतक लोहा शामिल हैं। चांदी से बनने वाली दवाओं में सोमनाथ रस, महामृगांक रस, त्रिलोकया चिंतामणि रस, मकारध्वज वटी, लक्ष्मीविलास रस, विजयपारपति, विषमज्वारंतक लौहा, जेहारमोहरा वटी, इंदुवाती, ग्राहनिकापात रस, कांडारप रस, ज्यामंगल रस, राजाताड़ी लौहा, नित्याड्या रस, सर्वाज्वारहरा रस, उन्मादबंजन रस, कल्याणसुन्दर रस, कुमुदेशावर रस, नवरतनराजमृगांका रस, कंचनाभरा रस शामिल हैं।
वसंतकुसमाकर और मकरध्वज रस और वटी का उपयोग कई गंभीर रोगों में होता है और साथ ही इनकी कीमत पहले से अधिक है। ये इनकी एक ग्राम की कीमत ही एक हजार रुपए से अधिक है। अब और बढऩा तय है, ऐसे में आयुर्वेदिक दवाओं और पद्धति से इलाज कराने वाले ज्यादा परेशान हो जाएंगे। आयुर्वेद से दूर जाने का एक कारण उसकी महंगी दवाएं भी हैं। कुल मिलाकर हमारे पास इसका कोई विकल्प नहीं है, इसलिए आयुुुुर्वेद का बाजार अधिक प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

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