Editorial
बजट का आकार बढ़ा
प्रदेश की हिस्सेदारी घटी

संजय सक्सेना
आम बजट में स्वास्थ्य और कृषि के साथ ही रक्षा के लिए बजट में खासी वृद्धि की गई है, लेकिन मध्यम वर्ग के लिए कोई बहुत बड़ी घोषणा नहीं हुई। इसके बाद भी बजट आकार बढ़ा है। पिछले साल के मुकाबले 7.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ इस बार 53.47 लाख करोड़ का बजट आया है। सरकार का फोकस अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने, और लोगों के खर्च करने की हैसियत बढ़ाने पर ज्यादा रहा है। पिछले साल के मुकाबले इस बार पूंजीगत खर्च में 1 लाख करोड़ का इजाफा किया कैंसर की 17 दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूट हटा दी गई है। इससे कुछ जरूरी कैंसर दवाएं सस्ती हो सकती हैं।
बजट में सबसे ज्यादा उम्मीद रहती है इनकम टैक्स रिबेट और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को लेकर। लेकिन इस बार आयकर में कोई राहत नहीं मिली है। इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की तारीखों में जरूर थोड़ा बदलाव हुआ है। इनकम टैक्स रिटर्न को रिवाइज करने की सीमा 31 दिसंबर से बढक़र 31 मार्च कर दी गई है। हालांकि 31 दिसंबर के बाद ऐसा करने पर कुछ अतिरिक्त फीस देने होगी।
जब बात अपने राज्य यानि मध्य प्रदेश की करते हैं तो इस बार उसे थोड़ा झटका लगता दिख रहा है। हमारी केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढऩे की बजाय कम हो गई है। केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को मान लिया है। ऐसे में अप्रैल 2026 से मार्च 2031 तक की अवधि के लिए केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी 7.86 प्रतिशत से घटाकर 7.34 प्रतिशत कर दी गई है। अब अगले पांच साल तक प्रदेश को हर साल करीब 7500 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।
यह नुकसान सिर्फ भविष्य तक सीमित नहीं है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए भी अनुमानों को संशोधित किया गया है। पहले जहां राज्य को 1,11,662 करोड़ रुपए मिलने का अनुमान था, वह अब घटकर 1,09,348 करोड़ रुपए रह गया है। यानी इसी साल प्रदेश को 2,314 करोड़ रुपए का तत्काल नुकसान होगा। यह कटौती ऐसे समय में हुई है जब राज्य सरकार जी राम जी जैसी योजना के लिए अपने हिस्से को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने की तैयारी कर रही है, जिससे उस पर वित्तीय बोझ और बढ़ेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कैपिटल एक्सपेंडिचर में जो प्रावधान किया है, उससे प्रदेश को फायदा मिल सकता है। केंद्रीय करों की हिस्सेदारी के रुप में इस बार 1.12 लाख करोड़ मिल सकते हैं। साथ ही अधोसंरचना विकास के लिए 2 हजार करोड़ रुपए मिलने का अनुमान है।
इस बजट में टू और थ्री टियर शहरों के इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए 12 लाख करोड़ का प्रावधान किया है। इसका फायदा इस कैटेगरी में आने वाले प्रदेश के 10 शहरों को मिल सकता है। वहीं देश में बनने वाली पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप में एक भोपाल को मिल सकती है। इस फंड से भोपाल, इंदौर जैसे बड़े शहरों को 7 हजार करोड़ तो बाकी शहरों को 5 हजार करोड़ तक मिल सकते हैं। इस राशि का उपयोग इन शहरों में सडक़ नेटवर्क, जल आपूर्ति, सीवेज प्रबंधन, और अन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए किया जाएगा, जिससे जीवन स्तर में सुधार होगा और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे। बड़े नगर निगम भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन 1 हजार करोड़ का बॉन्ड जारी कर केंद्र से 100 करोड़ तक का फायदा ले सकेंगे। बॉन्ड की पहले से जारी व्यवस्था भी प्रभावी है, जिसमें 200 करोड़ तक के बॉन्ड जारी करने पर केंद्र सरकार 18 फीसदी पैसा देती है।
बजट प्रावधान के अनुसार देश में बनने वाली पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप में एक भोपाल को मिल सकती है। यहां एयरपोर्ट के पास भौंरी में राज्य सरकार एआई और नॉलेज सिटी विकसित कर रही है। इसे यूनिवर्सिटी टाउनशिप में बदला जाता है तो केंद्र को पहली यूनिवर्सिटी टाउनशिप का प्रस्ताव तुरंत भेजा जा सकेगा। मप्र ने इस बजट में सिंहस्थ 2028 के आयोजन के लिए 20 हजार करोड़ रुपए के स्पेशल पैकेज की मांग की थी, लेकिन केंद्र ने इस संबंध में ऐसी कोई कोई घोषणा नहीं की।
अटल नवीनीकरण व शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत) 2.0 के तहत केंद्र ने 2025-26 के लिए 7,022 करोड़ रुपये जारी किए हैं, जिनका मुख्य फोकस जल आपूर्ति और सीवरेज प्रबंधन पर है। भोपाल में 194 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की शुरुआत हो चुकी है। इस योजना का एक अहम पहलू महिला अमृत मित्र की तैनाती है। मध्य प्रदेश शहरी विकास निगम के जरिए 10,000 महिला अमृत मित्र को तैनात किया जाएगा। ये महिलाएं सामुदायिक स्तर पर जल की गुणवत्ता की जांच करेंगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पीने के पानी की लाइनें किसी भी हाल में सीवरेज लाइनों के संपर्क में न आएं।
्रकुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बजट देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने वाला है, लेकिन मध्यप्रदेश के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा। शहरों के विकास के लिए भले ही विशेष राशि मिल रही है, लेकिन करों की हिस्सेदारी कम होना बड़ा नुकसान है। सिंहस्थ के कार्य शुरू हो गए हैं, ऐसे में अलग से बजट न मिलने से प्रदेश पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। और इसके लिए भी कर्ज लेना पड़ सकता है।

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