भारत में चीन और वहां के उत्पादों का भारी विरोध ही नहीं किया जा रहा है, अपितु चीन के खिलाफ माहौल भी बनाया जा रहा है, लेकिन इससे अलग हटकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से देश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती नजदीकियां कुछ और ही बयां कर रही हैं। सोमवार को जब चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी यानि सीपीसी का एक प्रतिनिधिमंडल बीजेपी नेताओं से मुलाकात के लिए दिल्ली में पार्टी मुख्यालय पहुंचा तो इसे बहुत चौंकाने वाली खबर माना गया। हालांकि भाजपा के प्रतिनिधिमंडल पहले भी चीन जाकर वहां की सत्ताधारी पार्टी से मुलाकातें कर चुके हैं। यहां खास बात यह भी है कि भाजपा वामपंथ की सबसे कट्टर विरोधी पार्टी मानी जाती है।
केंद्र में 12 साल से सत्ता चला रही भाजपा का वैचारिक अगुवा संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। ऐसे समय में चीन की सत्ताधारी चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल का दिल्ली में झंडेवालान स्थित आरएसएस के मुख्य कार्यालय में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले से मुलाकात का कार्यक्रम सामान्य नहीं कहा जा सकता। इससे पहले सोमवार को सीपीसी के एक छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा मुख्यालय में पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं से मुलाकात की। इसकी जानकारी बीजेपी महासचिव अरुण सिंह ने तस्वीरों के साथ खुद अपने एक्स हैंडल पर शेयर की है।
असल में 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों पड़ोसियों के आपसी रिश्तों में सबसे ज्यादा गिरावट जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की कोशिशों के बाद हुई हिंसक झड़प के कारण आई थी। इसकी वजह से आपसी संबंधों में इतनी दूरी आ गई, जिसे दोबारा पटरी पर लाने की कोशिशों में करीब पांच साल गुजर गए।
पार्टी के राज्यसभा सांसद अरुण सिंह ने चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद एक्स पर लिखा, इंटरनेशन डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के वाइस मिनिस्टर सुन हैयान ने बीजेपी मुख्यालय का दौरा किया। बैठक के दौरान हमने बीजेपी और सीपीसी के बीच संवाद और बातचीत कैसे बढ़ाएं, इसपर चर्चा की। सीपीसी नेताओं से बैठक के बाद भाजपा के विदेश मामलों के इंचार्ज डॉ विजय चौथाईवाले ने एक्स पर बताया कि महासचिव अरुण सिंह की अगुवाई में बीजेपी प्रतिनिधिमंडल और सीपीसी प्रतिनिधियों के बीच इंटर पार्टी कम्युनिकेशन को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। हालांकि यह खुलासा नहीं हुआ कि चर्चा क्या हुई?
दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर बीजेपी लगातार चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी से सीक्रेट डील पर हस्ताक्षर करने के आरोप लगाती रही है। यही नहीं, बीजेपी राहुल गांधी पर 2017 में डोकलाम संघर्ष के दौरान दिल्ली में चीनी दूतावास में उसके राजनयिकों से मुलाकात का भी दावा करती है, जिसका कांग्रेस खंडन करती है। ऐसे में चीनी सत्ताधारी दल के नेताओं से बीजेपी और संघ के पदाधिकारियों की बातचीत को लेकर हैरानी स्वभाविक है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि दुनिया भर के राजनीतिक दलों के साथ इस तरह की आपसी चर्चाएं होती रहती हैं। अभी नेपाल का भी एक प्रतनिधिमंडल आया था। बीजेपी के नेता भी चीन जाते रहे हैं। ये चीनी प्रतिनिधिमंडल संसद भी जाएगा। हमारी मुलाकात तो सार्वजनिक है, कोई डील थोड़े ही साइन कर रहे हैं।
पीछे पलट कर देखें तो भाजपा भले ही देश में चीन का विरोध करती आ रही है, लेकिन उसके और सीपीसी के नेताओं की इस तरह की मुलाकातों का सिलसिला 2000 के दशक की शुरुआत में ही शुरू हो गया था। बीजेपी के कई प्रतिनिधिमंडल चीन जाकर सीपीसी के नेताओं से मिल चुके हैं। लेकिन, 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों के जवानों में हुई हिंसक झड़प के बाद इस तरह के संवाद के मायने बढ़ गए हैं। इस संघर्ष के बाद दोनों देशों में जो एक दूरी पैदा हुई थी, उसे पाटने के प्रयास तब से शुरू हुए, जब अक्टूबर 2024 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए। इसके बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक स्तर की बातचीत में भी मजबूती आनी शुरू हुई और विमानों की सीधी आवाजाही का भी रास्ता खुलना शुरू हो गया।
अब देखना होगा कि भाजपा और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों की चर्चा के परिणाम क्या निकल कर सामने आते हैं? भारतीय विदेश नीति पर भी इसका कोई असर पड़ता है या नहीं? वैसे जिस तरह से अमेरिका आंखें तरेर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि भारत और चीन के रिश्ते मजबूत करने की गति दोनों ही तरफ से बढ़ेगी।
Editorial
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से भाजपा का संवाद
