संजय सक्सेना
नाटो दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य अलायंस माना जाता है, लेकिन अब नाटो के टूटने की आशंका पैदा हो गई है। और इसके पीछे मुख्य कारण होंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। खुद टं्रप कह रहे हैं कि अमेरिका इस अलायंस से निकलने की सोच रहा है। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भी इस अलायंस के सहयोगी देशों को अमेरिका के मुकाबले कम वित्तीय सहयोग देने पर खरी-खोटी सुनाई थी। दूसरे कार्यकाल में ईरान युद्ध में, खासतौर पर होर्मुज को खोलने में उनका साथ नहीं मिलने से अमेरिकी राष्ट्रपति बेहद खफा हैं और इस बीच उनका यह बयान आया है।
ट्रंप ने इस अलायंस यानि नाटो को कागजी शेर बताया है। अगर यह अलायंस टूटता है तो पश्चिमी देशों के सहयोग के इतिहास के लिए यह बहुत बड़ी घटना होगी। ऐसे तो ट्रंप नाटो को लेकर शिकायत लंबे अरसे से दर्ज कराते आए हैं, लेकिन इस बार जिन हालात में उन्होंने नाटो से बाहर निकलने की बात कही है, उन्हें देखते हुए मामला गंभीर लगता है। ट्रंप नाराज हैं, क्योंकि उन्हें ईरान में अकेले लडऩा पड़ रहा है। ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर ने कह दिया है कि यह उनकी लड़ाई नहीं है।
ट्रंप पूछते रहे हैं कि हम जिनके लिए लड़ते हैं, क्या वे हमारे लिए लड़ेंगे? और अब यूरोप के बर्ताव को वह सबूत के रूप में पेश कर रहे हैं। साथ लडऩा तो दूर, ईरान मुद्दे पर यूरोप विरोध में है। ब्रिटेन ने अपने सैन्य बेस की सशर्त इस्तेमाल की इजाजत दी है और स्पेन ने हमलों में शामिल अमेरिकी विमानों के लिए अपना स्पेस बंद कर दिया है।
हालांकि अमेरिका और नाटो के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद पहले भी रहे हैं, खासकर आर्थिक योगदान को लेकर। साल 2014 में तय हुआ था कि सदस्य देश अपनी जीडीपी का 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करेंगे। ट्रंप के लगातार दबाव बनाने के बाद नाटो सदस्यों ने इसे हासिल भी कर लिया है, पर अब बात उसके आगे की है। अमेरिका अभी तक ज्यादा सैन्य और आर्थिक हिस्सा इसलिए दे रहा था, क्योंकि इसके बदले में उसे नेतृत्व मिला हुआ था। लेकिन, ट्रंप की पॉलिसी अमेरिका फस्र्ट की है, जहां सहयोगियों से रिश्ता भी नफा-नुकसान पर चलता है। इसके चलते अन्य देशों के सत्ताधीश कहीं न कहीं नाराज भी दिखाई देते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की सोच है कि अमेरिका को उन मामलों में दखल नहीं देना चाहिए, जहां से उसे कुछ मिल न रहा हो, भले ही इससे अमेरिकी छवि को नुकसान पहुंचता हो। नाटो से अलगाव को अंजाम देना इतना भी आसान नहीं होगा, पर इतना तय है कि यह सैन्य गठबंधन अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।
असल में ट्रंप को ऐसा लगता है कि जितने देश अमेरिका के साथ हैं, वो मित्र के बजाय उनके गुलाम की तरह रहें। वह समझौता नहीं करते, सामने वाले को अपने अधीन करने का प्रयास करते हैं। हालिया मामला ईरान पर हमले का है। पहले ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर वहां अपने समर्थक को बैठाया और इसके बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए हमला कर दिया। वहां भी वह अपने समर्थक को राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं, लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं।
एक बात और सामने आ रही है। वो है एपस्टीन फाइल में ट्रंप का नाम शामिल होना। यह भी कहा जा रहा है कि टं्रप ने इस फाइल के चक्कर में आधी दुनिया को युद्ध में झोंक दिया। पूरी दुनिया को इसके दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे और इसकी शुरुआत हो चुकी है। पश्चिम मध्य एशिया में युद्ध खतरनाक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। लेकिन ट्रंप की सनक कम होती नहीं दिखाई दे रही है। रोज ट्रंप के ऊटपटांग बयान आ रहे हैं।
यही नहीं, ट्रंप सभी मित्र देशों को भी युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं। अपनी शर्तें मनवाना चाहते हैं। यह संभव नहीं दिख रहा है। यूरोप के सारे देश कहने को तो अमेरिका के साथ हैं, लेकिन इस युद्ध में वो अमेरिका के विरोध में खड़े होते दिख रहे हैं। इनमें अधिकांश देश नाटो के सदस्य भी हैं। ट्रंप पहले से ही नाटो को अधिक राशि देने का विरोध करते रहे हैं। अब जब ईरान के मामले में अधिकांश मित्र देश उनका साथ नहीं दे रहे हैं तो अब वे नाटो संगठन खत्म करने की धमकी देने लगे हैं।
हालांकि फिलहाल ट्रंप की धमकी के आगे यूरोपीय देश झुकते नजर नहीं आ रहे हैं, और यही बात ट्रंप को खल रही है। इसके चलते उनकी सनक और बढ़ती जा रही है। हो सकता है कि ट्रंप ईरान युद्ध के चलते ही नाटो संगठन समाप्त कर दें। वैसे इसका अधिक घाटा अमेरिका को ही होने की बात कही जा रही है। देखना होगा कि नाटो कब तक टिकता है।
संपादकीय
क्या नाटो के दिन पूरे हो गए हैं?
