Editorial
एक और चुनौती…!

संजय सक्सेना
बांग्लादेश की यूनुस सरकार की एक और साजिश सामने आई है। लेकिन यह भारत के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। असल में बांग्लादेश ने चटगांव में भारत को दी गई सेज (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) का भूमि आवंटन रद्द करते हुए लगभग 850 एकड़ में चीन का ड्रोन प्लांट बनाने की तैयारी कर ली है।
इस साल के अंत तक यहां प्रोडक्शन भी शुरू हो जाएगा। यहां मीडियम रेंज और वर्टिकल लिफ्ट वाले ड्रोन बनेंगे। चटगांव प्लांट भारतीय सीमा से 100 किमी दूर है। इससे बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत-पाक के बाद ड्रोन बनाने वाला तीसरा देश बन जाएगा। बांग्लादेशी वायुसेना ने चीन की सरकारी कंपनी चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉर्पोरेशन इंटरनेशनल (ष्टश्वञ्जष्ट) के साथ मंगलवार को एक बड़ी डील साइन की। यह डील सरकार से सरकार फ्रेमवर्क में हुई है।
इसके तहत चीन, बांग्लादेश में एक अनमैन्ड एरियल व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली प्लांट लगाएगा और टेक्नोलॉजी भी ट्रांसफर करेगा। दूसरी ओर चीन ने बीते साल बांग्लादेश को 20 जे-10 सीई फाइटर जेट देने की डील भी की थी। ये सप्लाई भी इस साल के अंत से शुरू हो जाएगी। चीन ने बांग्लादेश को पेमेंट में भी बड़ी मोहलत दी है। चटगांव में भारत को दिया गया स्पेशल इकोनॉमिक जोन मूल रूप से मीरसाराई क्षेत्र में नेशनल स्पेशल इकोनॉमिक जोन के अंदर प्रस्तावित था। यह पहले बंगबंधु शेख मुजीब शिल्पा नगर के नाम से जाना जाता था।
यह बांग्लादेश का सबसे बड़ा आर्थिक क्षेत्र है, जो चटगांव जिले के मीरसाराई उपजिला में स्थित है और ढाका-चटगांव हाईवे के साथ लगभग 60 किलोमीटर दूर चटगांव बंदरगाह से जुड़ा हुआ है। बांग्लादेश की इकोनॉमिक जोन्स अथॉरिटी इसे विकसित कर रही थी। 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच एक समझौता हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ढाका यात्रा के दौरान शेख हसीना के साथ संयुक्त घोषणा में भारत के निवेशकों के लिए एक इंडियन इकोनॉमिक जोन स्थापित करने का फैसला लिया गया।
यह गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट आधार पर था, जिसमें भारतीय निवेशकों को प्राथमिकता मिलती और भारत की लाइन ऑफ क्रेडिट से फंडिंग होती। मीरसाराई में लगभग 850-900 एकड़ भूमि आवंटित की गई थी। एक अन्य छोटा जोन मोंगला (बागेरहाट) में भी प्रस्तावित था। इसका मकसद द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाना, भारतीय निवेश आकर्षित करना, रोजगार सृजन करना और बांग्लादेश में भारतीय कंपनियों के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान करना था। 2019 में बेजा और अदानी पोर्ट्स एंड सेज के बीच एमओयू साइन हुआ था और भारत ने $115 मिलियन एलओसी से समर्थन दिया था।
भारतीय निवेशकों को प्राथमिकता मिलती। भारतीय कंपनियां एलओसी में आसानी से फैक्टरियां लगा सकतीं, जहां टैक्स छूट, ड्यूटी-फ्री आयात (कच्चे माल, मशीनरी आदि), वैट-फ्री बिजली/गैस/पानी, डिविडेंड टैक्स छूट, और अन्य फिस्कल इंसेंटिव्स मिलते। यह भारतीय फर्मों को बांग्लादेश में कम लागत पर उत्पादन करने की अनुमति देता है, खासकर ऑटोमोबाइल, फूड प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और अन्य सेक्टरों में।
परियोजना वर्षों से रुकी रही। फंड का केवल 1 प्रतिशत ही उपयोग हुआ और भारतीय ठेकेदारों में रुचि कम रही। 2024 में शेख हसीना की सरकार के हटने के बाद मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने अक्टूबर 2025 तक इस परियोजना को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया। जनवरी 2026 में बेजा के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन चौधरी अशिक महमूद बिन हारुन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि मीरसाराई में आवंटित खाली भूमि को अब डिफेंस इकोनॉमिक जोन या मिलिट्री इकोनॉमिक जोन के रूप में विकसित किया जाएगा।
इसके पीछे की वजह है बांग्लादेश अब अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाना चाहता है। वह स्थानीय हथियार और सैन्य उपकरण उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है। बांग्लादेश घरेलू जरूरतें पूरी करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात बढ़ाना चाहता है। लेकिन भारत के लिए यह चिंताजनक या चुनौती इस रूप में है कि यहां का काम चीन को दिया गया है। इस बहाने चीन भारतीय सीमा पर बांग्लादेश की तरफ से भी नजर रखेगा। कुल मिलाकर बांग्लादेश से एक तो भारत का एक काम बंद हो गया, दूसरे चीन को वहां अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल गया है। इससे भारत को और अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। भविष्य में इसकी आशंका भी रहेगी कि चीन वहां कोई सैन्य समझौता न कर ले। यह हमारे लिए और अधिक नुकसानदेह होगा।




