Editorial
इस विवाद पर विराम लगे

एक ओर संसद में एसआईआर को लेकर विरोध हो रहा है। रोजाना दोनों सदनों का बहुमूल्य समय हंगामे की भेंट चढ़ रहा है, दूसरी तरफ पूरा विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सडक़ पर उतर आया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और चुनाव आयोग के बीच का विवाद दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है। दुर्भाग्य से दोनों पक्ष आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं, जबकि मामले की गंभीरता को देखते हुए विवाद को सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
यहां मुद्दा केवल विपक्ष या लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लगातार लगाए जा रहे आरोपों का ही नहीं है, दांव पर चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता लगी हुई है, जो भारत की मजबूत लोकतांत्रिक परंपरा को देखते हुए कतई उचित नहीं कही जा सकती। इसलिए चुनाव प्रक्रिया से संबंधी किसी भी आशंका को जल्द से जल्द दूर किया जाना चाहिए। देखा जाए तो चुनाव जीतने के लिए क्या हथकंडे नहीं अपनाये जाते हैं। ऐसे-ऐसे काम होते हैं, जिनका भले ही सबूत नहीं दिया जा सकता, लेकिन उन्हें उचित भी नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र को कई बार ताक में रख दिया जाता है।
कांग्रेस और विपक्ष की दूसरी पार्टियां लंबे वक्त से चुनाव आयोग पर हमलावर रही हैं। ईवीएम को लेकर बहुत लंबी बहस हो चुकी है और इस पर हंगामा भी होता आ रहा है। लेकिन, देश के सामने अभी जो दृश्य चल रहा है, वह अभूतपूर्व माना जा रहा है। राहुल गांधी सहित पूरे विपक्ष के आरोप, सामान्य नहीं, अपितु  सीधे-सीधे चुनाव आयोग की निष्पक्षता, ईमानदारी और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल हैं।
राहुल ने इससे पहले महाराष्ट्र चुनाव में इलेक्टोरल रोल को लेकर धांधली का आरोप लगाया था। इस बार उन्हें दूसरे विपक्षी दलों का भी साथ मिल रहा है। राहुल का आरोप है कि महाराष्ट्र, हरियाणा और मध्य प्रदेश में हुए हालिया विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनाव तक, चुनावों के ऐन पहले बड़े पैमाने पर नए नाम जोड़े और काटे गए, जिसका फायदा कथित तौर पर भाजपा को मिला। राहुल के इन आरोपों को भारतीय जनता पार्टी बेबुनियाद बताती आई है। वह कहती है कि राहुल की यह चुनावी हार की खीझ है।
वहीं, राहुल गांधी के आरोपों पर चुनाव आयोग ने उनसे हलफनामा मांगा है। साथ ही, कर्नाटक समेत तीन राज्यों के चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं के नाम देने को कहा है, जो उनके हिसाब से गलत ढंग से काटे या जोड़े गए। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में चुनाव आयोग को बिंदुवार और स्पष्ट ढंग से अपना पक्ष रखना चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। विपक्ष का काम आरोप लगाना है और सत्तापक्ष के साथ ही सरकार का काम उसका निराकरण करना है। केवल कहने या प्रत्यारोप से काम नहीं चलेगा।
राहुल गांधी एक संवैधानिक पद पर हैं, और विपक्ष में होने के नाते उनका काम है कमियां उजागर करना व सरकार से जवाब मांगना। चुनाव आयोग भी संवैधानिक संस्था है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में इन दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए इनकी एक-दूसरे से असहमति, शिकायत मान्य है। परंतु, वर्तमान में जो घटनाक्रम चल रहा है, वह सामान्य असहमति से बहुत आगे निकल चुका है।
दोनों के बीच सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है, विपक्ष सडक़ पर उतर कर आ गया है, इसलिए इस पर विराम लगना आवश्यक हो गया है। आखिर यह लोकतंत्र के साथ ही चुनावों की निष्पक्षता का भी तो मामला है।
संजय सक्सेना

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