Editorial
रेरा और अपने घर का सपना 

संजय सक्सेना

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों रेरा के खिलाफ जो सख्त टिप्पणी की, उसने सबका ध्यान ही नहीं खींचा, कई लोगों में उम्मीदें भी जगा दीं। असल में रेरा को इस उम्मीद में बनाया गया था कि इससे अपने घर का सपना पूरा करने में लोगों को मदद मिलेगी और उन्हें बिल्डरों की मनमानी और भ्रष्टाचार से राहत मिलेगी, लेकिन हो रहा उलटा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेरा को बंद कर देना ही बेहतर है, क्योंकि यह डिफाल्टर बिल्डरों को फायदा पहुंचा रहा है और रिटायर्ड अधिकारियों का पुनर्वास केंद्र बन गया है। यह किसी एक राज्य पर नहीं, सभी राज्यों पर लागू हो रहा है।
यह अनुभव होने लगा है कि राज्य सरकारें रेरा के गठन पर दोबारा विचार करें। संसद ने रेरा इसलिए बनाया था, ताकि रियल एस्टेट सेक्टर में अनुशासन और पारदर्शिता आए और लोगों का भरोसा बने। उपभोक्ता कानून की तरह सिर्फ नुकसान होने के बाद मुआवजा देना इसका उद्देश्य नहीं था। अपितु रेरा को इस तरह बनाया गया था कि वह नुकसान होने से पहले ही उसे रोके। यानी लगातार निगरानी और सख्त कार्रवाई इसकी असली ताकत थी।
सवाल यह है कि क्या इसे सही तरीके से लागू किया गया? अगर रेरा के प्रविधानों को सख्ती से लागू किया जाता और पंजीकरण के समय बिल्डरों की पूरी और गंभीर जांच होती तो अधिकतर प्रोजेक्ट समय पर और बिना किसी शिकायत के पूरे होते। ऐसी स्थिति में बिल्डर समय पर प्रोजेक्ट पूरा करना अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाते। सही तरीके से लागू किया गया कानून सिर्फ सजा नहीं देता, अपितु  वह ऐसी व्यवस्था बनाता है, जहां अच्छा प्रदर्शन दिखे भी और उसे मापा भी जा सके।
समय पर और बिना विवाद के प्रोजेक्ट पूरा होने पर ही रेरा है तो भरोसा है जैसे नारे सच में भरोसा पैदा करते, सिर्फ नारा बनकर नहीं रह जाते, लेकिन हकीकत यह है कि पंजीकरण सिर्फ कागज अपलोड करने की प्रक्रिया बनकर रह गई है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बिल्डर के ब्रोशर में देशभर में कई परियोजनाएं दिखाई गईं, लेकिन रेरा पोर्टल पर केवल एक ही पंजीकृत परियोजना दर्ज थी और शिकायतों का डाटा भी बहुत कम था।
जब प्रोजेक्ट की सुविधाओं की जानकारी बिल्डर की वेबसाइट, स्वीकृत नक्शों और रेरा पोर्टल पर अलग-अलग दर्ज हो तो फिर कोई घर-खरीदार प्रोजेक्ट के बारे में सही और सटीक जानकारी कहां से हासिल करे? यदि जानकारी ही स्पष्ट न हो तो रेरा के वेब पोर्टल का घर-खरीदार को वास्तविक लाभ क्या मिला? बिक्री समझौते का मसौदा भी कई बार उपलब्ध नहीं होता, जिसे कानून के तहत अनिवार्य रूप से रेरा वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यह दिखाता है कि परियोजनाओं का पंजीकरण ठीक से नहीं किया जा रहा है और शुरुआत में ही सही जांच नहीं हो रही है।
रेरा कहता है कि प्रोजेक्ट की समय सीमा बढ़ाना सिर्फ खास परिस्थितियों में होना चाहिए, लेकिन कई राज्यों में एक्सटेंशन आम बात है। एक्सटेंशन मिलने के बाद भी सभी खरीदारों को अपने-आप मुआवजा मिलना शुरू नहीं होता। आम तौर पर देरी का कोई सीधा आर्थिक असर बिल्डर पर नहीं पड़ता, लेकिन घर-खरीदार के लिए देरी बहुत ही महंगी पड़ती है। कायदे से यह बिल्डर को भी महंगी पडऩी चाहिए। आज डाटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जमाना है। प्राधिकरण चाहें तो निर्माण की वास्तविक प्रगति की तुलना रिपोर्ट से कर सकते हैं, पैसों के प्रवाह को देख सकते हैं, जोखिम पहले से पहचान सकते हैं और भविष्य में उत्पन्न होने वाले किसी भी विलंब या विवाद को पहले ही पकड़ सकते हैं और समय रहते सुधारात्मक कदम उठा सकते हैं, लेकिन इस रोकथाम पर उनका ध्यान ही नहीं है जो कानून का मुख्य उद्देश्य है।
लगता है बिल्डर मानकर चल रहे हैं कि उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होगी। कोई कानून तभी काम करता है, जब नियम तोडऩा महंगा हो। अगर नियम तोडऩा सस्ता पड़े तो अनुशासन खत्म हो जाता है। जब नियम मानना वैकल्पिक लगे और नियम तोडऩे पर कोई खास नुकसान न हो तो कानून अपना असर खो देता है। कोई भी मजबूत कानून अगर नरमी से लागू किया जाए तो वह असरदार नहीं होता।
रेरा तभी सफल होगा, जब उसके प्राधिकरण अपनी मूल जिम्मेदारी पर लौटेंगे और कानून के प्रविधानों को सख्ती से लागू करके घर-खरीदारों की रक्षा करेंगे। रेरा ऐसी सख्त और सक्रिय कार्रवाई करे, जो अनुशासन स्थापित करे और देरी वाले प्रोजेक्ट समय पर पूरे कराए। रेरा को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहां शिकायत की नौबत ही न आए और तभी रेरा सफलता के नए आयाम लिख पाएगा। कानून मजबूत है, लेकिन जरूरत है इसे लागू करने के मजबूत इरादे की, जिससे लोगों को उनका अधिकार मिल सके। उनके अपने घर के सपने को साकार हो सके। 

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