संपादकीय
शक्ति- सनक बनाम इतिहास

संजय सक्सेना
एक शक्तिशाली सनकी राष्ट्रपति ने पुराने दौर के कुछ पागल शासकों की याद दिला दी, जिनके पागलपन का खामियाजा कई राज्यों के साथ ही बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों ने भी भुगता। वर्तमान सनकी राष्ट्राध्यक्ष कोई और नहीं, डोनाल्ड ट्रम्प है, जिसके कारण फिलहाल आधी दुनिया जंग में उलझी है और बाकी भी  बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
लेकिन कहावत है न, सेर को सवा सेर मिल ही जाता है। सो, ट्रम्प और उनके सहयोगी नेतन्याहू को ईरान मिल गया। एक रात में पूरी ईरानी सभ्यता नष्ट करने की चेतावनी देने वाले डोनाल्ड ट्रम्प को अचानक पांव पीछे खींचने पड़े हैं। इसके लिए उसने उस पाकिस्तान की आड़ ली, जो खुद रसातल की ओर जाता दिख रहा है। पाकिस्तान न केवल आतंकवादी पैदा करता है, अपितु आसपास युद्ध का माहौल बनाकर अपनी जनता को धोखे में रखकर और बर्बादी की तरफ धकेल देता है।
सही बात तो ये है कि ट्रम्प ने जिस तरह से युद्ध की घोषणा की, वो एक युद्धोन्मादी और अमानवीय किस्म का शासक ही कर सकता था। यह जंग अमेरिका की नहीं, अपितु उस इसरायल की है, जो नरसंहार का आदी हो चुकी है। यह यहूदियों का देश है और माना जाता है कि कुछ यहूदी मिलकर लंबे समय से पूरी दुनिया को चला रहे हैं, उन्हीं कुछ यहूदियों के दबाव में आकर ट्रम्प ने जंग का ऐलान किया, यह दावा किया जा रहा है। दावा यह भी किया जा रहा है कि युद्ध के पीछे एपस्टीन फाइल भी अहम वजह रही है।
असल में ट्रम्प एक नष्ट होती सभ्यता की पैदाइश हैं। वे उस नई बनती दुनिया के नुमाइंदे हैं, जिसमें नफरत, गाली-गलौज, संदेह और उत्पीडऩ लगातार स्वीकृत मूल्य बनते जा रहे हैं। इसका प्रसार भारत सहित पूरी दुनिया में होता दिख रहा है। ईरान की या दुनिया की तमाम सभ्यताएं ट्रम्प के घातक हमलों से नहीं, इन जैसे नेताओं के चुनाव से ही नष्ट होती हैं।
इसी से एक भयाक्रांत सवाल पैदा होता है। क्या सत्ता का मूल चरित्र वही होता है, जो ट्रम्प के हिंसक और अहंकारी वक्तव्यों से सामने आया है? ईरान की सभ्यता को नष्ट कर देने की बात कहने से पहले उन्होंने भद्दी गालियां देते हुए उसे डराने की भी कोशिश की थी। क्या यह अमेरिका की शक्ति से पैदा हुआ गुमान है कि वे हर किसी को नष्ट कर देने की सोचते हैं? और, क्या ट्रम्प की हरकतें इतिहास में दर्ज कुछ पागल-सनकी तानाशाह शासकों की याद ताजा नहीं कर रही हैं?
लेकिन, दुनिया के सबसे ताकतवर देश से मुकाबला होने के बाद भी ईरान ने अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ी और फिलहाल जीती है। ईरान का सबक यह है कि स्मृतियों पर हमले नहीं होने चाहिए- चाहे वे बाहर से हों या भीतर से। उन्हें मिटाने, बदलने और बिगाडऩे का काम नहीं होना चाहिए- क्योंकि अंतत: उन्हीं से अस्मिता बनती है, उन्हीं से एक स्वाभाविक राष्ट्रीय अभिमान बनता है, जिसके आगे ‘मागा’ या ‘अमेरिका फस्र्ट’ जैसी कृत्रिम और नस्लवाद की नफरत से पोषित अति-राष्ट्रवादी मुद्राएं हारने के लिए अभिशप्त होती हैं।
इसमें संदेह नहीं कि सभ्यता में शक्ति की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पुराने साम्राज्य ताकत की दम पर ही बड़े हुए। उनका विस्तार हुआ। बड़े सम्राटों की वीरता की विरुदावलियां गाई गई हैं। वीरता को आभूषण बताया गया है। हमारे यहां तो धार्मिक श्रुतियों में भी शक्ति की पूजा की गई है। परंतु धर्म हो या प्राचीन सभ्यता, उन्होंने यही सिखाया है कि वीर होने का अर्थ हिंसक होना नहीं है। वीरता अन्याय करने में नहीं, अन्याय का प्रतिकार करने में है। शक्तिशाली होना युद्धपिपासु होना नहीं है। शक्ति का उपयोग हो, दुरुपयोग नहीं।
सनकी सुल्तान ने चालीस दिन बाद एक ऐसी आड़ तलाशी, जो खुद बैसाखियों पर चल रह है। उसका नाम है पाकिस्तान। ईरान से बात करने की स्थिति में उसे वही दिख रहा था। फिर पाकिस्तान को श्रेय देकर अफगानिस्तान और आस-पास अमेरिका को अपने कुछ काम भी कराने होंगे। अफगानिस्तान में पाक हमले तो अमेरिका की शह पर ही हो रहे हैं।
इस अमेरिकी श्रेय से पाकिस्तान बड़ा खुश दिखाई दे रहा है। लेकिन यह खुशी बहुत कम समय की है। एक तो, खबरें यह भी आने लगीं कि चीन ने युद्ध रुकवाने में प्रमुख भूमिका निभाई। दूसरे, इसरायल ने युद्धविराम के दौरान ही लेबनान पर हमले कर दिये। ईरान ने इसे युद्ध विराम मानने से इंकार कर दिया। और सबसे बड़ी बात ये कि ट्रम्प के करीब जो भी गया, उसने मुंह की ही खाई है। सनकी शासक का मूड कब बदल जाए, कोई सोच भी नहीं सकता। जो भी हो, ईरान ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को नाकों चने चबवा दिए। इसके पीछे उसकी लंबी तैयारी, बेहतरीन रणनीति और पूरे देश की एकता को बड़ा कारक माना जा रहा है।
जहां तक तीसरे खिलाड़ी यानी इजराइल का सवाल है, वह ट्रम्प का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए ही कर रहा है। और ट्रम्प, जैसे ब्लैकमेल हो रहा है। अब उसके अपने ही देश में उसका भारी विरोध शुरू हो गया है। उसके सारे साथी देश उससे किनारा करते जा रहे हैं। उसकी सनक उस पर ही भारी पड़ रही है। नाटो के साथ ही संयुक्त राष्ट्र भी बिखराव की ओर उसके कारण ही जाते दिख रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका खुद ही बिखर जाए…।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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