संपादकीय
अब दवाओं पर कहर

संजय सक्सेना
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब दवाओं पर भी पडऩे लगा है। असर क्या इसे तो कहर भी कह सकते हैं, क्योंकि दवाओं की कीमतें दो गुना तक बढ़ा दी गई हैं। असल में खबर आ रही है कि जंग के चलते चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट्स की सप्लाई बाधित होने और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से मध्यप्रदेश की फार्मा इंडस्ट्री में शटडाउन तक होने का खतरा मंडराने लगा है।
फार्मा इंडस्ट्री में लगने वाले कच्चे माल की कीमतों में 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई है। इन बढ़ी हुई दरों में भी रॉ मटेरियल यानि कच्चे माल की सप्लाई नहीं हो पा रही है, जिससे फार्मा इकाइयों में काम बंद होने की नौबत आ गई है। मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां की 300 फार्मा इकाइयों में अब तीन शिफ्ट की जगह सिर्फ एक ही शिफ्ट में दवाओं का उत्पादन हो पा रहा है। नजीता यह है कि रोजमर्रा में काम आने वाली दवाएं जैसे पैरासिटामोल, एजिथ्रोमाइसिन, शुगर और बीपी की दवाएं महंगी हो गई हैं।
इंडियन ड्रग्स मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन यानि आईडीएमए की प्रदेश इकाई के सचिव डॉ. अनिल सबरवाल कहते हैं कि दवाओं में कच्चा माल एकदम से महंगा होने के कारण उत्पादी की दर बढ़ाना मजबूरी हो गया है। सरकार का डीपीसीओ यानी ड्रग एंटरप्राइजेज कंट्रोल अथॉरिटी है, उसने एक प्राइज दे रखा है कि आप किसी चीज को तय रेट से ज्यादा महंगा नहीं बेच सकते हैं। लेकिन वर्तमान में ओवरहेड खर्चे बढ़ गए हैं। 15 रुपए में 10 गोली का प्रोडक्शन कॉस्ट ही नहीं आ रहा है। ऐसे में सरकार 20 से 25 प्रतिशत रेट बढ़ाने की छूट  देती है, जो पहले ही दे चुकी है।
फार्मा इंडस्ट्री को मिडिल ईस्ट तनाव के कारण कच्चे माल के साथ ही पैकेजिंग वाली सामग्री की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। सप्लाई चेन बाधित है, इससे लागत में वृद्धि हो रही है और इंजेक्टेबल दवाओं के निर्माण के लिए आवश्यक गैस की भी कमी देखी जा रही है, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र के लिए ईंधन गैस की कटौती हो रही है।
ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स के जनरल सेक्रेटरी राजीव सिंघल ने बताया कि मध्यप्रदेश की फार्मा इंडस्ट्री की दवाइयां सबसे ज्यादा मध्यपूर्व के देशों में सप्लाई की जाती है। अभी रॉ मटेरियल जैसे एपीआई, साल्वेंट और एल्यूमिनियम की शॉर्टेज चल रही है। इसलिए न तो पर्याप्त मात्रा में दवाएं बन पा रही हैं और न ही सप्लाई हो पा रही है। इस कारण दवा कंपनियों ने इस समस्यों के बाद अपने रेट बढ़ा दिए हैं। बाजार में दवाएं महंगी हो गई हैं और रोजमर्रा तक की दवाएं अधिक दामों पर मिल रही हैं।
जहां तक फार्मा इंडस्ट्री के शट-डॉउन की बात है तो अगर कुछ और दिन कच्चा माल, एपीआई और साल्वेंट नहीं मिलेगा और गैस पर भी कटौती चली तो शट-डाउन करने के हालात बन जाएंगे और उत्पादन बंद करना पड़ेगा।
फार्मा इंडस्ट्री में दवाओं के उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा रॉ मटेरियल चीन से आता है। वर्तमान में चीन से आने वाले रॉ मटेरियल की सप्लाई चैन पूरी तरह से बंद कर दी गई है। पीथमपुर एसोसिएशन के गौतम कोठारी कहते हैं कि चीन से आने वाले रॉ मटेरियल जैसे डाइक्लोफेनेक, एमाक्सी, एजिथ्रोमाइसिन, पैरा-एमिनोफेनोल एम्पीसिलिन, पेनिसिलिन सहित अन्य ड्रग साल्वेंट की सप्लाई पूरी तरह से रुक गई है।
फार्मा इंडस्ट्री वालों का कहा है कि पेट्रोकेमिकल का सबसे बड़ा इम्पैक्ट प्लास्टिक इंडस्ट्री के बाद किसी पर आता है, तो वह फॉर्मा इंडस्ट्री है। पेट्रोकेमिकल से प्रोपलीन ग्लाइकोल, पीजी 400, पीजी 6000, पीजी 5000, एसीटोन, एमडीसी, आईसोप्रोपाइल पेट्रोकेमिकल से बनते हैं। पेट्रोकेमिकल से बने कच्चे माल के प्रोडक्ट के बिना बनी दवाएं सांस भी नहीं ले सकती हैं। इन सभी का उपयोग दवाओं को साफ करने, फिनिश करने और पालिशिंग के लिए किया जाता है। अशुद्धता दूर करने के लिए भी इन कच्चे माल की जरूरत पड़ती है।
भले ही दावा किया जा रहा है कि स्थितियां नियंत्रण में हैं, लेकिन खबरें जो आ रही हैं, वो इन दावों के एकदम उलट ही आ रही हैं। कहीं न कहीं हर क्षेत्र में असर पड़ रहा है। घर का राशन इस महीने से और महंगा हो गया है। और मौसम है कि लगातार खतरनाक हो रहा है। एकदम भीषण गर्मी, अचानक बादल, बरसात और ओलावृष्टि तक। दूसरी ओर हमारे शहरो की धूल और बर्बाद होता पर्यावरण। सब कुछ मानव स्वास्थ्य के लिए एकदम हानिकारक। ऐसे में जब दवाओं की उपलब्धता कम होगी, तो समस्या और बढ़ जाएगी।
फार्मा कंपनियों में जब आधा से लेकर एक तिहाई उत्पादन रह गया है, तो हम कितने दिन तक सामान्य स्थिति की कल्पना कर सकते हैं। दवाओं का महंगा होना तय है और यदि कंपनियों ने शट डाउन कर दिया, तो हालात और बिगड़ेंगे। सरकारों को इस तरफ भी ध्यान देना होगा। दवाओं के प्रति गंभीरता दिखाना होगा, तभी आम आदमी को कुछ राहत मिल पाएगी।

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