संपादकीय
सेना के मामले में भी लापरवाही…?

संजय सक्सेना
हमारे देश का सिस्टम कैसा है, ये इस बात से समझ में आता है कि यहां सेना के मामले में भी लापरवाही बरतने से परहेज नहीं किया जाता। सोमवार को संसद में पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि जो लोग हमारी और हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, उनके स्वास्थ्य पर ही ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सीएजी की रिपोर्ट में देश के कई मिलिट्री अस्पतालों के रखरखाव में कमी की ओर तो इशारा किया ही गया है, यह भी बताया गया है कि बड़ी संख्या में सेना के जवानों को उनके वेतन-भत्ते समय पर और सही तरीके से नहीं मिल रहे हैं।
सीएजी की रिपोर्ट बता रही है कि सेना के निर्माण कार्यों से जुड़े साइट रिकॉर्ड्स ठीक से नहीं रखे गए। इससे काम की गुणवत्ता और ठेकेदार की जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो गया। ऑडिट ने सिफारिश की है कि रक्षा मंत्रालय साइट रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज करे। साइट रिकॉर्ड्स वे कागज होते हैं, जिनमें काम की प्रगति, इस्तेमाल मटेरियल और टेस्ट रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रोविजनल फाइनल सेटलमेंट ऑफ अकाउंट्स (पीएफएसए) की समीक्षा तय समय पर नहीं हुई। इसके कारण रिटायरमेंट के समय अधिकारियों, जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स यानि जेसीओ और दूसरे रैंक के कर्मियों से एक साथ बड़ी राशि की वसूली करनी पड़ी। आईटी सिस्टम में जरूरी नियम शामिल नहीं होने से कई सेना के जवानों को उनका वेतन और भत्ता समय पर और सही तरीके से नहीं मिला।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पीटीओ यानि प्रिविलेज टिकट ऑर्डर यानी छुट्टी पर जाने के लिए मिलने वाले टिकट जारी करने में देरी हो रही है। एचआरएमएस सिस्टम में जानकारी सही से नहीं मिल रही, इसलिए कई आवेदन खारिज हो रहे हैं। ऑडिट ने कहा है कि अलग-अलग सिस्टम के बीच तालमेल बेहतर किया जाए। रिजेक्ट मामलों की निगरानी के लिए ऑटोमेटेड सिस्टम बनाया जाए।
सीएजी द्वारा कुछ चयनित जगह ही जांच की जाती है। रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले कुछ मिलिट्री अस्पतालों का अधिकारियों ने दौरा किया तो उन्हें कई दिक्कतें मिलीं। तमाम अस्पतालों की इमारतें पुरानी हैं, लेकिन उनकी नियमित जांच नहीं हो रही है। साफ है कि इनकी मरम्मत को लेकर घोर लापरवाही बरती जा रही है। एक मामले में जून 2022 में लैंसडाउन के एक मिलिट्री अस्पताल का हिस्सा गिर गया था। कई जगह हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग और फायरफाइटिंग सिस्टम भी पूरे नहीं हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि आम्र्ड फोर्सेज मेडिकल स्टोर्स डिपो मिलिट्री अस्पतालों की जरूरत की दवाएं पूरी नहीं दे पाए। कॉमन ड्रग लिस्ट की दवाएं भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थीं। दो डिपो में तो दवाओं को समय पर बदला नहीं गया, जिससे 13.52 करोड़ की दवाएं फंसी रहीं। इसके कारण सेना के जवानों और उनके परिजनों को बाहर इलाज करवाना पड़ रहा है।
ऑडिट में यह भी पाया गया कि कई जगह बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों का पालन नहीं हुआ। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी से जुड़े दस्तावेज भी नहीं रखे गए। कुछ अस्पतालों में बिना लाइसेंस के की वेस्ट मैनेजमेंट वाली मशीनें चलाई जा रहीं थीं। रिपोर्ट से पता चलता है कि सात कमानों की समीक्षा की गई, जिसमें से वेस्टर्न कमांड यानि पश्चिमी कमान में सबसे ज्यादा नियमों का उल्लंघन के साथ ही लापरवाही भी देखने को मिलीा। रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय ने कुछ मामलों में सुधार के कदम उठाने शुरू किए हैं, लेकिन कई समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।
ये रिपोर्ट केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सीएजी द्वारा तैयार की गई है। सीएजी कुछ नमूना जांच करती है और फिर रिपोर्ट बनाकर सरकार को देती है। सीएजी अपनी तरफ से कुछ सिफारिशें भी करती है, लेकिन देखने में आता है कि चाहे राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार, सीएजी रिपोर्ट केवल सदनों के पटल में रखकर इतिश्री कर ली जाती है। या तो इन पर ज्यादा चर्चा नहीं होती और होती भी है तो सरकारें या तो इन रिपोर्ट को खारिज कर देती हैं और मानती भी हैं तो आश्वासन देकर मामले को टाल दिया जाता है। जहां सीएजी अधिकारियों को दोषी मानकर कार्रवाई की सिफारिश करती है, वहां तो रिपोर्ट फाइलों में ही दफन कर दी जाती है।
लेकिन यहां मामला हमारी सेनाओं में शामिल जवानों और अधिकारियों का है। सेना के अस्पतालों को सेना की तरह ही अनुशासित माना जाता है। उम्मीद भी की जाती है कि जिन्हें हम विशेष मानते हैं, उनके लिये तो सिस्टम बेहतर काम कर रहा होगा, लेकिन यहां तो सब धान बाईस पसेरी दिख रहे हैं। यानि, सेना के मामले में भी लापरवाही और उदासीनता बरती जा रही है। सीएजी की रिपोर्ट पर कार्रवाई बहुत कम होती है, फिर भी सरकार से उम्मीद की जा सकती है कि वह सेना के मामले में तो इस लापरवाही को सुधार सकती है। सीएजी रिपोर्ट से हटकर देखें, तो भी सेनिकों और उनके परिजनों को सामान्य तौर पर सिविल अस्पतालों और निजी अस्पतालों में इलाज कराते देखा जा सकता है। यह हमारे सिस्टम की असफलता ही कही जाएगी।

