संजय सक्सेना
नीट-यूजी 2026 का पेपर लीक और परीक्षा रद्द होना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, अपितु भारत की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था के गहरे संकट का संकेत है। और यह पहली बार नहीं हुआ है। 22 लाख से अधिक छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह परीक्षा केवल एक टेस्ट नहीं थी, बल्कि वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदों का केंद्र थी। ऐसे में परीक्षा रद्द होने से पैदा हुई मानसिक, आर्थिक और सामाजिक पीड़ा स्वाभाविक ही नहीं, हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। े
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर बार-बार वही गलतियां क्यों दोहराई जा रही हैं? यदि 2024 में भी नीट पेपर लीक का मामला सामने आया था और तब सर्वोच्च न्यायालय तक हस्तक्षेप करना पड़ा था, तो उसके बाद परीक्षा सुरक्षा प्रणाली को अभेद्य क्यों नहीं बनाया गया? जब सरकार डिजिटल इंडिया, आधार और ऑनलाइन बैंकिंग जैसी विशाल प्रणालियां सुरक्षित ढंग से संचालित कर सकती है, तो देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं की गोपनीयता सुनिश्चित करना इतना कठिन क्यों साबित हो रहा है?
समस्या केवल तकनीकी नहीं, संस्थागत भी है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानि एनटीए को 2018 में इस उद्देश्य से बनाया गया था कि प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाओं को पेशेवर और पारदर्शी तरीके से संचालित किया जा सके। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा स्थगन, उत्तर-कुंजी की गलतियां और रिजल्ट विवाद लगातार उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते रहे हैं। जब संसद की स्थायी समिति तक यह कह चुकी है कि अनेक परीक्षाएं गंभीर अनियमितताओं से प्रभावित हुईं, तब यह केवल एक दुर्घटना नहीं रह जाती, बल्कि व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी बन जाती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि देश की अन्य बड़ी परीक्षाएं — जैसे ठ्ठयूपीएससी या सीबीएसई अपेक्षाकृत कम विवादों में रहती हैं। इसका अर्थ है कि सुरक्षित परीक्षा संचालन असंभव नहीं है। फर्क संस्थागत क्षमता, जवाबदेही और प्रक्रियागत अनुशासन का है। इस संकट का सबसे दुखद पक्ष छात्रों पर पडऩे वाला मानसिक दबाव है। भारत की कोचिंग संस्कृति ने मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं को जीवन-मरण के संघर्ष में बदल दिया है। कोटा, सीकर और प्रयागराज जैसे शहरों में हजारों छात्र परिवारों से दूर रहकर कठिन प्रतिस्पर्धा में जुटे रहते हैं। मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जमा-पूंजी, स्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारियां तक दांव पर लगा देते हैं। ऐसे में परीक्षा रद्द होना केवल एक और मौका नहीं होता, बल्कि भावनात्मक थकान और असुरक्षा का विस्फोट बन जाता है।
सरकार का यह निर्णय सही है कि मामले की सीबीआई जांच हो और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, लेकिन वर्तमान हालात में सीबीआई पर भी सवालिया निशान लगा हुआ है। जांच में उच्च स्तर के आरोपी पूरी तरह से छूटते आए हैं और शायद इसीलिए बार-बार घटनाएं हो जाती हैं। ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली की ओर बढऩा भी आवश्यक कदम हो सकता है, क्योंकि इससे पेपर प्रिंटिंग और वितरण से जुड़ी कमजोरियां कम होंगी। लेकिन केवल तकनीक बदलने से समस्या खत्म नहीं होगी। यदि सिस्टम में भ्रष्ट नेटवर्क, अंदरूनी मिलीभगत और निगरानी की कमी बनी रही, तो ऑनलाइन परीक्षा भी साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो सकती है।
अब आवश्यकता केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की है। कुछ जरूरी कदम इस प्रकार हो सकते हैं। जैसे- परीक्षा सुरक्षा के लिए स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और रियल-टाइम निगरानी। एनटीए की कार्यप्रणाली की संसदीय या न्यायिक समीक्षा। परीक्षा प्रबंधन में जवाबदेही तय करना और अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई। छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता और काउंसलिंग तंत्र। प्रतियोगी परीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करने हेतु मेडिकल शिक्षा में सीटों और अवसरों का विस्तार।
इनमें एनटीए की कार्यप्रणाली का ईमानदारी से विश्लेषण सबसे आवश्यक मुद्दा है। यहां जिस व्यक्ति के हाथों में कमान सौंपी गई है, वह पहले से आरोपों में घिरा हुआ है। इससे सरकार की मंशा पर भी सवाल उठता है। वह मध्यप्रदेश में सहायक प्राध्यापक भर्ती घोटाले का आरोपी था और उसे सीधे-सीधे बचा लिया गया। इसके बाद उसे केंद्रीय एजेंसी की कमान सौंप दी गई। यह सबसे बड़ी विडम्बना है हमारी व्यवस्था की।
फिलहाल वर्तमान व्यवस्था से कोई उम्मीद तो नहीं है, फिर भी परीक्षा प्रणाली में सुधार की उम्मीदें तो बनी ही रहेंगी। नीट की लीक के वो अपराधी सामने आ पाएंगे, जो निचले पायदान वाले हैं। सही मायने में जो अपराधी हैं, वो सफेदपोश हैं और वे हमेशा जिंदा ही रहने वाले हैं। फिर भी प्रणाली में परिवर्तन से कुछ सुधार की गुंजाइश की उम्मीद कर सकते हैं।
