Editorial
Bihar में भी ऑपरेशन लोटस…गठबंधन की सीढ़ी से सत्ता की मंजिल तक

संजय सक्सेना

अंतत: भारतीय जनता पार्टी का आपरेशन लोटस  बिहार में भी कामयाब हो गया।मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक 105 दिन बाद नीतीश कुमार को राज्यसभा का पर्चा भरवा दिया गया। अब वह मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे और बिहार में पहली बार भाजपा अपना सीएम बना सकती है। इधर जनता दल यू के कार्यकर्ता छाती पीट रहे हैं, उधर भाजपा के अंदरखाने में जश्न मनाया जा रहा है। विपक्ष इसकी घोषणा पहले ही कर चुका था।
यह कोई बहुत चौंकाने वाली घटना नहीं है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि भाजपा ने नीतीश को हटाने में इतनी देर कैसे कर दी? बीजेपी अबतक गठबंधन के सहारे सत्ता में आकर 3 राज्यों पर कब्जा जमा चुकी है और 2-3 राज्यों में ऐसी कोशिशें अभी चल रही हैं। यह बात और है कि 3 राज्यों में ऐसी कोशिशें नाकाम भी हुई हैं।
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से इस घटना का इंतजार किया जा रहा था। कहा जा रहा था कि बिहार में भी जल्द ही महाराष्ट्र दोहराया जाएगा। सवाल तो चर्चाओं में आ ही गया है कि दोस्त पार्टियों के बूते पहले ताकत हासिल करना और फिर पूरी तरह सत्ता पर काबिज होना, क्या यह बीजेपी का पैटर्न बन गया है? कई राजनीतिक विशेषज्ञ बिहार के घटनाक्रम को ‘ऑपरेशन लोटस’ का क्लोन भी कह रहे हैं।
वर्तमान में 89 सीट के साथ बीजेपी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी है। इसलिए पूरी संभावना है कि बिहार सरकार का अगला सीएम भाजपा से होगा। वो तो कुछ मजबूरियां थीं, जिनके चलते चुनाव जीतने के बाद नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सहमत होना पड़ा, नहीं तो भाजपा अपना ही मुख्यमंत्री बनाती। एक बड़ा कारण केंद्र की सरकार को बचाने का भी रहा। ये भी कह सकते हैं कि इसी कारण भाजपा ने इतने दिन नीतीश को झेला।
दरअसल, 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 67 सीटें मिली थीं और नीतीश की अगुवाई वाली समता पार्टी को 34 सीटें मिली थीं। इसके बाद भी अटल बिहार वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी ने नीतीश को अपना नेता चुना था और वह पहली बार बिहार के सीमए बने। हालांकि, तब विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के दौरान लालू यादव ने नीतीश को पटखनी दे दी थी। और 7 दिन ही सरकार चली थी, लेकिन भाजपा के लिए नेता नीतीश ही रह गए और वह उनकी पिछलग्गू बनी रह गई।
कहा जा रहा है कि भाजपा में खास तौर पर गृह मंत्री अमित शाह नहीं चाहते थे कि 20 नवंबर 2025 को गांधी मैदान में नीतीश कुमार सीएम पद की शपथ लें। ऑफर दिया गया कि नीतीश कुमार अपनी पसंद के किसी नेता का नाम बता दें। वे जिसे अपनी पसंद बता देंगे, भाजपा उसे स्वीकार कर लेगी। नीतीश ने तब ये प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। जदयू की तरफ से कहा गया कि मैंडेट नीतीश कुमार के नाम पर मिला है, तो सीएम भी वही बनेंगे। इसके बाद उन्होंने सीएम पद की शपथ ली। हालांकि चुनाव के दौरान ही नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर लगातार सवाल उठने लगे थे। लेकिन वह खुद तैयार नहीं हुए।
असल में भारतीय जनता पार्टी ने बीते कुछ सालों में एक खास रणनीति के तहत कई क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करके सत्ता में हिस्सेदारी ली, उसके बाद अपना कैडर और वोट बेस तैयार किया। सहयोगी दलों की पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को भी शामिल किया। कथित तौर प र दूसरे दलों में फूट भी डाली। इसके बाद राज्य में नंबर एक पार्टी बन गई और सहयोगी दल कमजोर पड़ते चले गए।
महाराष्ट्र में भाजपा का बालासाहेब ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना से गठबंधन 1989 से शुरू हुआ था। धीरे-धीरे बीजेपी ने अपनी जमानी तैयार करना शुरू किया। 2014 विधानसभा चुनाव में सीट शेयरिंग पर विवाद के बाद गठबंधन तोड़ दिया। बीजेपी अकेले 122 सीटें जीतीं, जबकि शिवसेना 63 सीटों पर सिमट गई। शिवसेना सरकार में तो शामिल रही, लेकिन खुद में कमजोर होती चली गई। 2019 में बीजेपी 105 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और शिवसेना को केवल 56 सीटें मिलीं। गठबंधन की सरकार बनी और बीजेपी के देवेंद्र फडनवीस सीएम बने।
2022 में एकनाथ शिंदे ने 39 विधायकों को साथ लेकर उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करके सरकार गिरा दी। उद्धव के गुट वाली शिवसेना को असली शिवसेना का सिंबल मिला। एकनाथ शिंदे सीएम बने, भाजपा के देवेंद्र फडनवीस को डिप्टी सीएम बनना पड़ा। इसके बाद 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले शरद पवार की एनसीपी में भी दो-फाड़ हुआ। इसका आरोप भी भाजपा पर ही लगा। एनसीपी अजित पवार और भाजपा शिवसेना (शिंदे गुट) के महायुति गठबंधन में शामिल हो गई। बीजेपी को 132 सीटें शिवसेना शिंदे गुट को 57, एनसीपी अजित गुट को 41 सीटें मिलीं। देवेंद्र फडनवीस तीसरी बार सीएम बने और भाजपा की रणनीति सफल हो गई।
ऐसी रणनीति ओडिशा और गोवा में भी अपनाई गई। ओडिशा में बीजू जनता दल से गठबंधन की राजनीति खेली गई और अब वहां बीजद बाहर है, भाजपा सत्ता में काबिज हो गई। राज्य में बीजेपी के सामने अपनी जमीन गंवाने वाली बीजद केंद्र में किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं रही।
2026 में पांच विधानसभा चुनाव होने हैं। ये राज्य असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी हैं। असम में बीजेपी सत्ता में है। पुडुचेरी में अलायंस की स्थिति मजबूत है। वहीं पश्चिम बंगाल और केरल में छोटी-छोटी पार्टियों के साथ अलायंस करके चुनाव लडऩे की तैयारी में है। असम में एसआईआर के सहारे भाजपा काफी मजबूत दिख रही है, लेकिन बंगाल में असमंजस की स्थिति है। बंगाल और केरल में कोई ऐसी बड़ी पार्टी नहीं, जिसके साथ मिलकर भाजपा सत्ता की सीढिय़ां चढ़ सके। फिर भी वहां अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। देखना होगा कि बिहार के बाद भाजपा का जादू और कहां चलता है?

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