संपादकीय
मानवता-संवेदना ताक पर

संजय सक्सेना
अमेरिका और इसरायल द्वारा ईरान पर जिस तरह से हमला किया गया, वह अब पूरी तरह से युद्ध में बदल गया है, लेकिन एक बेहद चिंतनीय बात यह है कि
युद्ध के मौजूदा दौर में मानवीय मूल्यों को पूरी तरह से ताक पर रखा जा रहा है। शुरुआती दौर में ही ईरान में स्कूल और अस्पताल पर भी हमले किये गये, जिनमें बड़ी संख्या में छात्रों सहित निर्दोष लोग मारे गए।
रूस- यूक्रेन युद्ध से लेकर अमेरिका-इसरायल और ईरान जंग तक, जैसे-जैसे संघर्ष का दायरा बढ़ रहा है, मानवता को आघात पहुंच रहा है। पिछले शुक्रवार को दक्षिण लेबनान में एक मेडिकल सेंटर पर इस्राइल ने हमला किया था, जिसमें 12 स्वास्थ्यकर्मियों की जान चली गई। लेबनान का दावा है कि मौजूदा संघर्ष शुरू होने के बाद से चिकित्सा सुविधाओं पर कम से कम 37 हमले हुए हैं और 31 हेल्थकेयर स्टाफ की मौतें हुई हैं। इसी तरह, ईरान पर हमले के पहले ही दिन अमेरिका-इस्राइल की मिसाइल एक स्कूल पर जा गिरी थी, जिसमें लगभग 170 लोगों की मौत हो गई और इसमें ज्यादातर बच्चे थे।
अंतरराष्ट्रीय कानून, खासकर जिनेवा कन्वेंशन कहता है कि जीवन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचों पर हमला नहीं किया जा सकता। मेडिकल स्टाफ को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। ऐसे हमले कानूनी ही नहीं, नैतिक रूप से भी गलत हैं। लेकिन, आंकड़े कहते हैं कि आज किसी को न नैतिकता की पड़ी है और न नियमों की। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार केवल यूक्रेन में ही 2022 के बाद से अभी तक हेल्थ केयर फैसिलिटीज पर 2881 हमले हो चुके हैं। और अस्पताल ही नहीं, पश्चिम एशिया संकट में तो पानी और तेल के ठिकाने भी निशाना बन रहे हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि तेल ही इस युद्ध में प्रमुख निशाने पर बना हुआ है।
इस तरह की घटनाएं बार-बार इसलिए हो रही हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अब कोई वास्तविक ताकत नहीं बची। वल्र्ड ऑर्डर में केवल एक चीज मायने रख रही है, वो ये कि कौन किस पर किस तरह से हावी हो सकता है? जरूरत निंदा और आलोचना से आगे ठोस कार्रवाई की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर यह तय करना होगा कि ऐसे हमलों की निष्पक्ष जांच की जाए और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होना ही चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि ये करेगा कौन?
इस समय जब पश्चिम एशिया और खासकर, होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी दुनिया की सांस अटकी है, एक और इलाका है, जहां हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं और निर्दोष लोगों को जान गंवानी पड़ रही है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान के हवाई हमले अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। दोनों देशों के बीच ताजा टकराव पिछले महीने 26 तारीख को शुरू हुआ था, जब पाकिस्तान ने एकतरफा खुले युद्ध की घोषणा कर दी। काबुल-कंधार समेत कई इलाकों में पाकिस्तानी सेना ने एयरस्ट्राइक की है।
तालिबान का आरोप है कि गुरुवार रात भी हवाई हमले किए गए, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। जवाबी हमले तालिबान की तरफ से भी हो रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान के मुकाबले उसकी सैन्य ताकत बेहद कम है, खासकर हवाई क्षमता।
इस संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। डूरंड रेखा के दोनों तरफ रहने वाले पहले ही आतंकवाद,गरीबी समेत तमाम कठिनाइयां झेल रहे हैं। दावों के मुताबिक पाकिस्तान के हमलों में 150 से ज्यादा अफगानियों की मौत हो चुकी है। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, लगभग 1.15 लाख लोगों को अपना घर-बार छोडऩा पड़ा है।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते 2021 में तालिबान की वापसी के बाद से लगातार खराब होते गए हैं। पिछले साल अक्टूबर में भी दोनों के बीच टकराव हुआ था, लेकिन अभी हालात ज्यादा नाजुक है। यहां खास बात यह है कि पाकिस्तान बार-बार अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। और कहीं न कहीं पाकिस्तान को अमेरिका की शह मिली हुई है। इसकी वजह से गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो चुका है।
पाकिस्तान की कार्रवाई असल में अपनी नाकामियों का ठीकरा पड़ोसियों पर फोडऩे की उसकी नीति का एक हिस्सा है। भारत ने यूएनएससी में पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन पर लताड़ा है। संयुक्त राष्ट्र और बाकी जिम्मेदार सदस्य देशों को भी इस मामले में दखल देना चाहिए। दुनिया के बाकी संघर्षों की तरफ ही अफगानिस्तान में भी मासूम जानें दांव पर लगी है। उनको तालिबान शासन की वजह से अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।
कुल मिलाकर इस युद्ध में न कोई नियम से चल रहा है और न ही मानवता का ध्यान रखा जा रहा है। दुनिया के ताकतवर देशों की आदत कुछ ऐसी हो गई है कि वो अपनी संप्रभुता किसी भी कीमत पर कायम करने की ठाने हुए हैं। अमेरिका पूरी दुनिया का चौधरी बनना चाहता है और इसी लाइन पर काम कर रहा है। ईराक, अफगानिस्तान लंबी जंग में ही बर्बाद हुए हैं, कई और देश भी बर्बाद हो चुके हैं, अब ईरान और कुछ अन्य देशों की बारी है। लेकिन मानवता को ताक में रखना ताकतवर देशों को महंगा तो पड़ेगा ही। दुनिया को बेवजह विनाश की खाई में धकेलना कहीं से उचित नहीं है।



