संपादकीय
वन दिवस और बिखरते जंगल

संजय सक्सेना
धरती के फेफड़े कहे जाने वाले वनों को बचाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए आज पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय वन दिवस मना रहा है। जलवायु परिवर्तन के दौर में वनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पेड़ों के बिना मानव जीवन की कल्पना असंभव है।
लेकिन सवाल उठता है, क्या वास्तव में हम अपनी जिम्मेदारी निभा पर रहे हैँ? क्या तेजी से बढ़ते शहर वनों की अंधाधुंध कटाई का मुख्य कारण नहीं बन रहे हैँ? क्या पर्यावरण और इको सिस्टम के संतुलन पर उतना ध्यान दिया जा रहा है, जितना जरूरी है? जो आंकड़े सामने आ रहे हैँ, वो भयावह हैँ।
असल में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2012 में 21 मार्च को अंतरराष्ट्रीय वन दिवस के रूप में घोषित किया था। वनों का महत्व केवल स्वच्छ हवा और ऑक्सीजन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये करोड़ों लोगों को आजीविका, भोजन और आश्रय भी प्रदान करते हैं। इस वर्ष की थीम वनों और नवाचार पर केंद्रित है जो यह बताती है कि कैसे नई तकनीक के जरिए हम जंगलों की कटाई को रोक सकते हैं और लुप्त हो रही वनस्पतियों को बचा सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन यानि एफ ए ओ द्वारा जारी ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेज असेसमेंट 2025 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार हमारी धरती से हर साल औसतन 1.09 करोड़ हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं। यह क्षेत्रफल मिस्र जैसे बड़े देश के कुल आकार के बराबर है।
रिपोर्ट में एक और चिंताजनक तथ्य यह सामने आया है कि नए वन क्षेत्र विकसित करने की रफ्तार भी सुस्त पड़ गई है। साल 2000 से 2015 के बीच जहां हर साल 9.88 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र का विस्तार हो रहा था वहीं अब यह सिमटकर केवल 6.78 मिलियन हेक्टेयर रह गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि हम जितने पेड़ काट रहे हैं उतने नए पेड़ लगाने और उन्हें बचाने में पीछे छूट रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में पृथ्वी की कुल भूमि का लगभग 31 से 32 प्रतिशत हिस्सा ही वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यदि वैश्विक जनसंख्या के आधार पर इसका औसत निकाला जाए तो दुनिया के हर व्यक्ति के हिस्से में अब केवल 0.5 हेक्टेयर जंगल ही बचा है। जंगलों की यह घटती संख्या जैव विविधता और वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए भी बड़ा खतरा है।
रिपोर्ट में जंगलों में लगने वाली आग को भी विनाश का एक बड़ा कारण बताया गया है। एफ ए ओ के मुताबिक हर साल औसतन 261 मिलियन हेक्टेयर भूमि आग की चपेट में आती है जिसमें से आधा हिस्सा वनों का होता है। आग की इन घटनाओं ने न केवल वनों को नष्ट किया है बल्कि वायुमंडल में भारी मात्रा में जहरीली गैसें भी छोड़ी हैं।
मध्य प्रदेश की बात करें तो हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य प्रदेश वन भूमि डायवर्जन  यानि विकास परियोजनाओं के लिए जंगल काटने में देश में सबसे आगे है, जहाँ पिछले 10 वर्षों में 38,553 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि नष्ट की गई है। देश के कुल वन भूमि डायवर्जन में अकेले मप्र का 22 प्रतिशत हिस्सा है, जिससे जैव विविधता और वन्यजीवों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। वन विभाग द्वारा दी गई मंजूरी के बाद विकास के नाम पर सबसे ज्यादा जंगल मध्यप्रदेश में कट रहे हैं। राज्य में 5 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि पर अतिक्रमण की खबरें हैं, जो वनों के विनाश को और बढ़ा रही हैं।
साथ ही बांधवगढ़, कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व के पास के जंगलों के कम होने से बाघ अब रिहायशी इलाकों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ गया है।सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने मप्र के जंगलों में ‘पारिस्थितिक सूखे’ की चेतावनी दी है, जहाँ पानी की कमी से वन अपनी संरचना खो रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वनों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर कठोर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना असंभव होगा। हम मध्य प्रदेश को भले ही अधिक सुरक्षित मानें, पर जंगल ख़त्म होने रफ़्तार चिंताजनक तो है। आज ही हमें जागना होगा। केवल कागजी कार्यवाही नहीं, जमीन पर परिणाम लाने होंगे। पृथ्वी सुरक्षित है तभी हम सुरक्षित रह पायेंगे।

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