संपादकीय
जानलेवा आनलाइन गेमिंग और सरकार की अनदेखी…

संजय सक्सेना
आनलाइन गेमिंग की लत इतनी खतरनाक है कि इस लत की वजह से देश में आत्महत्या के साथ ही हत्याओं का भी दौर शुरू हो गया है। बताया जा रहा है कि दिल्ली में आईआरएस अधिकारी की बेटी के साथ दुष्कर्म और हत्या का आरोपी नौकर ऑनलाइन गेमिंग की लत की वजह से 7 लाख रुपये के कर्ज के जाल में फंस गया था। और इसी के चक्कर में उसने हत्या की। सट्टेबाजी में नुकसान होने पर आत्महत्या की खबरें भी आए दिन पढऩे को मिल जाती हैं।
एम्स और इहबास के डॉक्टरों के अनुसार गेमिंग डिसऑर्डर और नशे के कॉम्बो से अवसाद, चोरी, धोखाधड़ी, पोर्नोग्राफी के साथ ही अन्य कई अपराध बढ़ रहे हैं। हालांकि ऑनलाइन गेमिंग की महामारी से लोगों को बचाने के लिए पिछले साल संसद से कानून बना था, लेकिन सवाल तो यहां भी उठता है कि कानून किसी लत या अपराध को कितना रोक पाता है?
कानून के जानकार बताते हैं कि संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार तो सट्टेबाजी और जुए को रोकने हेतु कानून बनाने के लिए केंद्र के पास अधिकार ही नहीं हैं। तेलंगाना, तमिलनाडु, कनार्टक, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने इस मर्ज पर लगाम कसने के लिए कानून बनाने की पहल की थी। राज्यों के साथ मिलकर युवाओं को गेमिंग के मर्ज से निजात दिलाने के बजाय आईटी से जुड़े नियमों में परिवर्तन और एडवाइजरी की आड़ में केंद्र सरकार उलटे गेमिंग कम्पनियों के कारोबार को बढ़ावा देती नजर आ रही है।
संदर्भ में जाएं तो पता चलता है कि 2022 में एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया ने 18 से कम उम्र के बच्चों के संबंध में एडवाइजरी जारी की थी। लेकिन नए नियमों में बच्चों को पैसे के लेन-देन वाले गेम्स से दूर रखने के बारे में स्पष्ट प्रावधान नही हैं। 2023 में संसद से पारित डीपीडीपी कानून के अनुसार गेमिंग कम्पनियां बच्चों के डेटा का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। लेकिन उन्हें लागू करने के लिए नए नियमों में कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए कुछ ठोस नहीं हो पा रहा है।
डेटा को विदेश जाने से रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाने के लिए 2020 में टिकटॉक और पबजी जैसे 177 चीनी एप्स पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। ईडी जांच में चीनी गेमिंग एप के म्यूल खातों से साइबर अपराधों को बढ़ावा देने और क्रिप्टो के माध्यम खरबों के हवाला लेन-देन का खुलासा हुआ था। गेमिंग चैट से युवाओं को कट्टरपंथ और आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। गेमिंग कम्पनियों के आपराधिक तंत्र पर लगाम के लिए इन नियमों में कठोर दंड का प्रावधान नहीं है।
कौशल आधारित खेलों के पुराने वर्गीकरण को समाप्त करके ई-स्पोर्ट्स की आड़ में मनी गेमिंग एप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन विरोधाभासों और कानूनी बारीकियों का लाभ उठाकर गेमिंग कम्पनियां खरबों के टैक्स भुगतान से बचने की कोशिशें कर रही हैं। यही कारण है आज देश में विदेशों से संचालित हो रही गेमिंग कम्पनियां अरबों-खरबों का गैर-कानूनी कारोबार तो कर ही रही हैं, साथ ही बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी भी कर रही हैं। पुरस्कार राशि पर 58 हजार करोड़ की आयकर चोरी और 2.50 लाख करोड़ की जीएसटी चोरी के मामले तो अदालतों में चल रहे हैं।
सरकार के पीआईबी नोट में ऑनलाइन सट्टेबाजी, जुआ, लॉटरी, फैंटसी स्पोर्ट्स, पोकर और रमी जैसे कार्ड गेम पर रोक लगाने का दावा किया गया था। नए नियमों में रियल मनी गेमिंग पर प्रतिबंध की गोल-मोल बात की गई है। सवाल यह है कि नए नियमों से ऑनलाइन सट्टेबाजी और गैम्बलिंग पर प्रतिबंध लगा है या नहीं? अगर प्रतिबंध नहीं लगा तो सरकार राज्यों के साथ मिलकर प्रभावी कानून क्यों नहीं बनाती? अगर लगा है तो बताना चाहिए कि राज्यों से जुड़े विषय पर केंद्र ने किस संवैधानिक हक से कानून बनाया है?
विधि आयोग ने तो एक बार यह तक कहा था कि अगर सख्त कानून होता तो युधिष्ठिर भी अपने भाइयों और पत्नी को दांव पर नहीं लगाते। लेकिन पहले जो गलत हुआ, तो क्या उसे सुधारा नहीं जा सकता? उदाहरण के तौर पर पहले बाल विवाह हुआ करते थे, बाद में उन पर रोक लगाई गई। जो परंपराएं समाज के लिए नुकसानदेह साबित हो रही हैं, उनके लिए सरकार कदम उठा सकती है। कानून बना सकती है। आन लाइन गेमिंग के लिए यदि सरकार संसद में कोई कानून लाती है, तो उसका विरोध नहीं होना चाहिए। लेकिन पहल तो सरकार को करनी ही होगी। आनलाइन गेमिंग की लत परिवार तो तोड़ ही रही है, जानलेवा भी हो गई है। यही नहीं, इससे देश को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसे समाजहित में तो कतई नहीं माना जा सकता। कहीं न कहीं सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को भी इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहिए।

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