संपादकीय
गेहूं के लिए तारीख पर तारीख…?

संजय सक्सेना
मध्य प्रदेश में गेहूं की खरीदी की तारीख पर तारीख के चलते किसान परेशान है और उसका नुकसान होना शुरू हो गया है। हजारों क्विंटल नहीं, हजारों टन गेहूं कट चुका है और खलिहानों में असुरक्षित पड़ा हुआ है, इस पर बारिश-ओलों ने आफत बरसाना शुरू कर दिया है। सरकार में बैठे लोगों को इस नुकसान की आशंका का शायद कोई अंदाजा ही नहीं है।
मध्यप्रदेश में गेहूं की फसल तो बेहतर बताई जा रही है, लेकिन खरीदी की तारीख बढ़ाए जाने से उनका नुकसान होना शुरू ही हो गया है। पहले बात करते हैं, तारीख की। तो समर्थन मूल्य पर खरीदी दस अप्रैल से शुरू होगी। भोपाल, इंदौर, उज्जैन और नर्मदापुरम संभाग के 23 जिलों में किसानों से गेहूं खरीदा जाएगा, जबकि बाकी जिलों में 15 अप्रैल से गेहूं बेचा जा सकेगा।
असल बात यह है कि अधिकांश हिस्सों में गेहूं की फसल काटी जा चुकी है और गेहूं भी निकल चुका है। सरकारी खरीदी में देरी होने से बड़ी मात्रा में गेहूं खुले में पड़ा हुआ है। अधिकांश किसानों के पास छांव में रखने की व्यवस्था नहीं है। एक तरफ सरकार खरीदी नहीं कर रही है, दूसरी तरफ मौसम ने अपने तेवर दिखाना शुरू कर दिये हैं। बिन मौसम बरसात हो रही है, तो कहीं-कहीं ओले भी पड़े हैं। एक बार फिर बारिश की संभावना बताई जा रही है। पछले 2 दिन में उज्जैन, शाजापुर, राजगढ़, सीहोर समेत 12 जिलों में ओले गिर चुके हैं। ये प्रदेश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक जिलों में से एक है। वहीं, नर्मदापुरम, विदिशा, इंदौर, भोपाल समेत 41 जिलों में बारिश भी हुई है। आंधी की रफ्तार 63 किलोमीटर प्रतिघंटा तक पहुंच गई है।
इसके अलावा एक बड़ा खतरा आग का भी है। खेतों में खड़ी फसलों में आग लगने की घटनाएं भी शुरू हो गई हैं। कई लोग पराली जला रहे हैं, जिसकी आग समीप पड़े खलिहानों तक पहुंच जाती है। कई जगह तो खड़ी फसल में ही आग लगने की घटना हो चुकी है।
ऐसे में अपना गेहूं खराब होने से बचाने के लिए कई किसानों ने गेहूं खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है। किसान मंडी व खुले बाजार में बिचौलियों को अपना गेहूं 2200 से 2400 रुपए प्रति क्विंटल बेचने को मजबूर हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर समेत अधिकांश जिलों में इस बार गेहूं का अच्छा उत्पादन हुआ है, लेकिन खरीदी आगे बढ़ा दी गई है।   किसानों का कहना है कि तेज आंधी से उनकी गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा है। यह किसानों के ऊपर बड़ी आपदा है, क्योंकि फरवरी में भी ऐसा ही मौसम था, जबकि मार्च में दो बार ओलावृष्टि हो चुकी है। ऐसे में किसान अपना गेहूं सरकार को बेचना चाह रहे हैं, लेकिन सरकार ने 1 अप्रैल की बजाय 10 अप्रैल से खरीदी करने के आदेश दिए हैं। इससे किसान मंडी व खुले बाजार में गेहूं बेचने को मजबूर है। जहां समर्थन मूल्य से 200 से 400 रुपए तक कम मिल रहे हैं।
सरकारी खरीदी शुरू नहीं होने से किसान मंडियों में गेहूं लेकर पहुंच रहे हैं। यहां अच्छी क्वॉलिटी के गेहूं को तो फिर भी थोड़े ठीक दाम मिल रहे हैं, लेकिन बाकी किसान परेशान हैं। भोपाल की करोंद मंडी में करीब ढाई हजार क्विंटल गेहूं बिकने पहुंचा, जो न्यूनतम रेट 2100 और अधिकतम 2700 रुपए प्रति क्विंटल तक बिका। अधिकांश लोगों को इसमें नुकसान ही हुआ है।
केवल खराब मौसम और आग लगने की घटनाएं ही नहीं, अपितु कई और भी मजबूरियां हैं, जिनके चलते किसान जल्दी गेहूं बेचना चाह रहा है। ज्यादा छोटे किसानों के पास तो जीविकोपार्जन तक के लिए व्यवस्था नहीं होती, इसलिए बेचते हैं। फिर, शादियों का सीजन भी शुरू हो गया है। इसके लिए लोग कर्ज तक लेते हैं। फसल बेचना उनकी भी मजबूरी हो जाती है।
लेकिन, शायद उच्च स्तर पर लोगों को इन मजबूरियों का भान नहीं है। मंत्री को तो इन समस्याओं से शायद कोई लेना-देना ही नहीं, तभी तो उनकी तरफ से कोई पहल नहीं हुई। विपक्षी नेता जब किसानहित में बयान देते हैं तो उन्हें इसमें राजनीति ज्यादा दिखती है। भले ही राजनीति हो रही हो, लेकिन यह बात भी तो अपनी जगह सही है कि गेहूं की खरीदी में देरी से किसानों को नुकसान होना शुरू ही हो गया है।
एक तरफ सरकार गेहूं की खरीदी देर से कर रही है, तो दूसरी तरफ सत्तापक्ष के विधायक के वेयरहाउस में बड़ी मात्रा में गेहूं मिल रहा है। यह गेहूं कहां से आया, जांच का विषय है। कहा जा रहा है कि किसानों से कम दामों में बेचकर रखा गया है। बताया जा रहा है कि 500 टन गेहूं 50-50 किलो के नए बोरों में भरा था, जिनकी संख्या 11,700 है। 550 क्विंटल गेहूं गोदाम में खुले में रखा था। समर्थन मूल्य 2585 रुपए प्रति क्विंटल के आधार पर इसकी कीमत 1.43 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई है। खरीदी शुरू होने से पहले ही 12 हजार बारदाने  पहुंचा दिए गए थे, जिनमें स्टॉक भरा गया। जबकि बाजार में खाली बारदाने यानि बोरे मिल नहीं रहे हैं।
कुल मिलाकर फिलहाल जो किसान वर्तमान समर्थन मूल्य को भी पर्याप्त नहीं मान पा रहा है, उसे इससे और कम मूल्य में अपनी फसल बेचनी पड़ रही है, या फिर खराब मौसम के हवाले करनी पड़ रही है। बारिश-ओले से जब गेहूं का दाना खराब हो जाता है, तो उसके दाम और कम हो जाते हैं। यही कारण है कि किसान व्यापारियों के हाथ लुटने को मजबूर है और सरकार खरीदी की तारीख बढ़ा चुकी है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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